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साल 2018 तय करेगा त्रिवेद्र का सियासी बजूद!

‘जननायक’ बनने को लेने होंगे कड़े फैसले

साल 2018 तय करेगा त्रिवेद्र का सियासी बजूद!

‘जननायक’ बनने को लेने होंगे कड़े फैसले

देहरादून। नया साल, नई उम्मीदें। कुछ ऐसी ही भावना मन में लेकर हम काम करते हैं कि आने वाला साल हमारे लिए और खुशहाली और तरक्की लेकर आये। उत्तराखंड की आवाम को भी पिछले 17 सालों से ऐसे ही हर साल का इंतजार रहता है कि इस साल पिछले साल के मुकाबले हमारी सरकारें हमारे लिए और मजबूती और बेहत्तर ढंग से काम करेगी। कुछ उम्मीदें पूरी होती हैं तो कुछ हर साल टूट जाती हैं। अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आने के बाद यहां भाजपा और कांग्रेस ने ही राज किया। जनता की उम्मीदें कितनी पूरी हो पायें यह कहना तो मुश्किल है? क्योंकि जिन मूलभूत समस्याओं को दूर करने की मांग जनता कर रही है खासतौर से पहाड़ की जनता आज भी वो जस की तस हैं? सरकारों के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। भ्रष्टाचार इन 17 सालों में कितना बढ़ा है यह सबके सामने हैं।

जनता की उम्मीदों पर साल 2017 में खरा उतरने का प्रयास किया राज्य के 9वें मुख्यमंत्री का पदभार संभाल रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत ने। राज्य में भ्रष्टाचार रोकने को लेकर कड़े फैसले लिए तो पलायन की समस्या से निपटने के लिए आयोग का गठन कर कई योजनाओं पर काम करना भी शुरू किया है। जनता की उम्मीदें सरकार से बढ़ गई हैं पर साल 2000 में उत्तराखंड बनने के बाद से ही इस सूबे में पलायन को रोकना सबसे बड़ी चुनौती रही है। 17 साल में सरकारें बदली, साल दर साल करते-करते 8 मुख्यमंत्री भी बदल गए लेकिन बावजूद इसके यहां के गांवो के हालात जस के तस रहें। 17 साल पहले बने इस पहाड़ी राज्य में त्रिवेन्द्र सिंह रावत भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले 5वें नेता हैं। उनसे पहले नित्यानंद स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, बीसी खंडूरी और रमेश पोखरियाल निशंक मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

साल 2018 में जनता की उम्मीदों पर खरा ऊतरने के साथ ही मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है मंत्रीमंडल विस्तार की। मंत्रीमंडल में 2 सीटें खाली पड़ी हुई जिनकी वजह से कहीं न कहीं सरकार का काम प्रभावित हो रहा है। इन दो कुर्सियों पर किसकी तैनाती होगी यह किसी चुनौती से कम नहीं है। क्योंकि इन दो सीटों को लेकर बीजेपी के अंदर एक अनार सौ बीमार वाली स्थिती है। इसके साथ ही अभी तक सरकार ने दायित्वों का बंटवारा नहीं किया है। जिस पर बरिष्ठों के साथ ही तमाम कार्यकर्ताओं की निगाहें लगी हुई हैं। दायित्वों का भी ऐसा बंटवारा होना है कि कहीं से भी विरोध का कोई स्वर न फूटे। इन सबके बीच सबसे बड़ी चुनौती है नगर निकाय व पंचायत चुनाव में भाजपा का झंडा बुलंद करने की। क्योंकि इसके बाद सीधा 2019 का लोकसभा चुनाव है और यदि नगर निकाय व पंचायत चुनाव में कुछ गड़बड़ी हुई तो इसका असर साल 2019 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा। ऐसे में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को इस मोर्चे पर खुद को साबित करना होगा। अगर कहीं से भी कुछ कसक बाकी रह गई तो विरोधी हल्ला मचाने का कोई मौका नहीं छोड़ेगे।


इन वादों को पूरा करना होगा एक बड़ी चुनौती ?

नए जिलों के गठन का मुद्दा
उत्तराखंड में अभी कुल 13 जिले हैं। 4 से 5 जिले और बनाए जाने की मांगें समय-समय पर उठती रही हैं। कुछ जिलों के निर्माण के लिए पूर्व में बीसी खंडूरी की सरकार के अंतिम दिनों में पहल भी हुई, लेकिन आचार संहिता के चलते इस पर आगे नहीं बढ़ा जा सका। बाद में कांग्रेस सरकार के दौरान इस ओर कोई पहल नहीं हुई। अंतिम दिनों में हरीश रावत सरकार भी इस ओर सक्रिय तो दिखी, लेकिन फिर मामले को अगली सरकार के लिए टाल दिया गया। अब देखना होगा कि त्रिवेंद्र रावत की सरकार में नए जिलों के गठन की पुरानी मांग कब तक पूरी होती है।

पलायन और पहाड़ों में रोजगार
पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग के पीछे प्रमुख कारणों में पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के साधनों की कमी और इसके चलते बढ़ता पलायन भी था। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद भी न तो पहाड़ों में रोजगार के साधनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और न ही पलायन पर रोक लग पायी। बल्कि अलग राज्य बनने के बाद पलायन और ज्यादा बढ़ने के संबंध में आंकड़े सामने आते रहे हैं। पहाड़ों में कई गांव तो बिल्कुल खाली हो चुके हैं। त्रिवेंद्र रावत की सरकार को पहाड़ों में रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के साथ ही पलायन पर रोक लगाने के लिए आयोग गठन के साथ ही जमीनी स्तर पर काम करना होगा।

राजधानी गैरसैंण का मुद्दा
बर्तमान में गैरसैंण राजधानी को लेकर तमाम संगठन सड़कों पर हैं। राजधानी गैरसैंण का मुद्दा नया नहीं है। साल 1994 में जब उत्तराखंड आदोलन अपने चरम पर था, उसी दौरान कुमाऊं और गढ़वाल के बीच चमोली जिले में स्थित गैरसैंण को आंदोलनकारियों ने राजधानी घोषित कर दिया था। इसके पीछे तर्क यही था कि पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में होगी तो इससे पहाड़ों के विकास में तेजी आएगी। लेकिन जब साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बना तो उस समय देहरादून को अस्थायी राजधानी घोषित किया गया। इसके बाद भी गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के लिए तमाम बातें हुईं, लेकिन सरकारें देहरादून में अवस्थापना विकास करती रहीं।

भाजपा का विजय डॉक्यूमेंट लागू कराना होगा
उत्तराखंड में चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने मतदाताओं को लुभाने के लिए परंपरागत घोषणापत्र की बजाए कुछ हटकर दृष्टि पत्र, यानी विजन डाक्यूमेंट जारी किया था। विजन डाक्यूमेंट में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और आधारभूत ढांचे जैसे विषयों को जगह दी गई तो युवा और महिलाओं पर भी पूरा फोकस किया गया। अब त्रिवेंद्र रावत पर साल 2018 में इस दृष्टि पत्र को पूरी तरह से लागू करना और उत्तराखंड के आम लोगों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने की जिम्मेदारी होगी।

इन योजनाओं पर भी करना होगा काम
किसानों को आर्गेनिक खेती के लिए खास तौर पर लोन की व्यवस्था
साल 2019 तक हर गांव में सड़क
मेधावी छात्रों को लैपटॉप और स्मार्टफोन
24 घंटे बिजली-पानी की सप्लाई
यूनिवर्सिटी में फ्री वाई-फाई की सुविधा
गेस्ट फैकल्टी और अढॉक के टीचर्स-एम्पलॉई के लिए सैलरी और पेंशन
गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही रीजन में हॉस्पिटल और हेल्थ सेंटर की बेहत्तर व्यवस्था

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