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बिना जनसमर्थन अधूरा है गैरसैंण आंदोलन!

आंदोलनों के लिए जनता का भरोसा पहली और आखिरी शर्त

सुभाष तराण
       सुभाष तराण

बिना जनसमर्थन अधूरा है गैरसैंण आंदोलन!

आंदोलनों के लिए जनता का भरोसा पहली और आखिरी शर्त

प्रिय प्रदीप,
मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ लेकिन लोक तंत्र में बिना जन समर्थन के चार  आदमी की हड़ताल कोई मायने नही रखती। ऐसे आंदोलन तभी कामयाब होते है जब मुद्दों को जनता के बीच ले जाकर उन्हे जनता का मामला बनाया जाए। क्योंकि गैरसैण पहाड़ी राज्य की अवधारणा की अस्मिता का मामला है इसलिए गैरसैण को गैरसैण या चमोली भर का नहीं, पूरे उत्तराखंड की जनता का समर्थन चाहिए होगा। गाँव कस्बों में अकेले दम पर जन सरोकारों की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले स्वयंभू अगुआओं, लिखवारों, तथाकथित समाज सेवियों और उनके जैसे उत्तराखंड की चिंता जताने वालों का मैं लेखों और सोशल मीडिया के माध्यम से कईयों बार आह्वान कर चुका हूँ। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात होता है। पाँच साल तक चिल्ल पौं करने वाले यह सब के सब बौद्धिक जन चुनाव आते ही अपने अपने घरों में दुबक कर शांत हो पड़ जाते हैं। जन आंदोलनों के नाम पर उत्तराखंड भर में यहाँ वहाँ फुटकर में फैले मुट्ठी भर क्रांतिकारियों से कुछ भी हासिल नही होने वाला। हम सबको यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता की ताकत का कोई जोड़ नही है। उत्तराखंड आंदोलन के साथ साथ चिपको, नशा नहीं रोजगार दो जैसे जन आंदोलनों को याद किजिए। भले ही इन सफल आंदोलनो के अगुआ असफल हुए लेकिन इन आंदोलनों ने उत्तराखंड को एक नयी दिशा दी।
आंदोलनों के लिए जनता का भरोसा पहली और आखिरी शर्त है। लेकिन उसके लिए आपको जनता के पास जाना होगा। अगर आपका जनता से कोई संवाद ही नहीं तो फिर आपकी लड़ाई जनता की लड़ाई कैसे? जनता की लड़ाई लड़ते हुए चुनाव में जमानत जफ्त नही हो सकती। जनता लोभ लाभ से परे निस्वार्थ भाव से जमीन पर एकजुट होकर काम करने वालों को हमेशा सर माथे पर रखती है। दिल्ली की आम आदमी पार्टी को ही ले लिजिए। व्यक्तिगत महत्वकाँक्षाओं के चलते आप राजनीति नही धंधा कर सकते हो। वैश्विक विचारधारा के नाम पर अपने अपने दडबों में सिमट कर ईरान तूरान की कहने से उत्तराखंड और उसकी नीरीह जनता का भला कभी नही होने वाला। आपको उत्तराखंड के गाँव कस्बे कदमों से नापने होंगे। काँग्रेस भाजप के इतर जन सरोकारों की बात करने वाला कौन सा ऐसा क्षेत्रीय नेता या सामाजिक कार्यकर्ता है जो आराकोट से लेकर असकोट तक और हरिद्वार से लेकर हर्सिल तक के गाँव कस्बों के लोगों की समस्याओं का चश्मदीद हो? धरने पर बैठने की बजाय जन सरोकारों के मुद्दों से लेस होकर क्यों नही कोई चार लोग उत्तराखंड के ओर छोर की यात्रा कर लेते। चार आप होंगे, आपके साथ पांचवा मैं रहूँगा। एक बार कोशिश तो किजिए, जब आम जन की समस्याओं की बात उसके सामने होगी तो वे भी आपकी इस मुहिम मे शामिल होंगे। फिर देखिए, कैसे चार से चालीस हजार होते हैं। उत्तराखंड की समस्या केवल राजधानी भर की नहीं है, यहाँ की गैर-जिम्मेदार और काहिल नौकर शाही तथा यहाँ की राजनीती में ईच्छाशक्ति का अभाव उससे भी बड़ी समस्या है। लेकिन ऐसी पहल करने लायक है कौन, विचार इस बात पर किया जाना चाहिए।

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