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देश में बढ़ रही बच्चों की तस्करी

देहरादून में भिखारी बच्चों की बाढ़


देश में बढ़ रही बच्चों की तस्करी

– देहरादून में भिखारी बच्चों की बाढ़
– सरकार के साथ समाज का ताना-बाना भी जिम्मेदार
– एक करोड़ भिखारी सड़कों पर मांगते हैं भीख
– दून में बच्चे वाली भिखारन या भिखारी की रोज की कमाई 700 रुपये : चाइल्ड हेल्पलाइन
गुणांनद जखमोला, बरिष्ठ पत्रकार
   गुणांनद जखमोला,              बरिष्ठ पत्रकार


देहरादून राजपुर रोड स्थित राजकीय पूर्व माध्यामिक स्कूल। शाम के चार बजे करीब चाइल्ड हेल्पलाइन के एक युवा कर्मी व एक युवती एक बच्ची को लेकर पहुंची। हेल्पलाइन पर किसी ने शिकायत की कि चुक्खूवाला में इस बच्ची का सौतेला पिता इसको खूब पीटता है और मां भाग गई है। अब इस बच्ची का भविष्य खतरे में है। चाइल्ड हेल्पलाइन चाहते हैं कि इस बच्ची को स्कूल कम हाॅस्टल में रख लिया जाए। स्कूल के प्रधानाचार्य हुकुम सिंह उनियाल ने ऐसे ही यतीम 235 बच्चों को स्कूल में दाखिला दिया है और उनका जीवन संवार रहे हैं। यह एक मिसाल है कि सरकारी शिक्षक यदि चाहे तो समाज को बदल सकता है, लेकिन सवाल चैंकाने वाला है। पता लगता है कि समाज का एक बड़ा वर्ग पिता या माता धड़ाधड़ रिश्तों को बदल रहे हैं, यानी एक के बाद एक शादी कर रहे हैं और बच्चों को यतीम बनाने का कार्य कर रहे हैं। या उनकी जिम्मेदारी समाज पर छोड़ रहे हैं। लिहाजा बच्चे यदि उनियाल जी जैसे लोगों के हाथों में न पड़ें तो चाइल्ड ट्रैफिंकिंग के शिकार हो जाते हैं या भीख मांगने को बाध्य। देहरादून की चाइल्ड हेल्पलाइन में रोजाना 15-20 काॅल बच्चों की समस्याओं को लेकर आती है। चैंकाने वाले आंकड़े हैं कि यदि देहरादून में किसी बच्चे को लिए महिला या पुरुष भीख मंगवाते हैं तो उनकी रोजाना की आय औसतन 700 रुपये प्रतिदिन है यानी 21 हजार रुपये महीना। सवाल आय का भी नहीं है, इन लावारिश बच्चों के भविष्य का है। देहरादून में लगभग पांच साल पहले गिनती के भिखारी थे लेकिन अब इस शहर में भिखारियों की बाढ़ आ गई है। हम दया कर इन बच्चों को भीख तो दे देते हैं लेकिन इनके भविष्य के बारे में कतई नहीं सोचते। क्या बच्चे सचमुच अनाथ हैं? क्या मानव तस्करी का नतीजा तो नहीं है? क्या इनका शारारिक और मानसिक शोषण तो नहीं हो रहा है। इस पर नहीं सोचते।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की इस साल की रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड समेत देश में मानव तस्करी के मामलों में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और उत्तराखंड नेपाल से लाई जा रही लड़कियों व लड़कों की तस्करी के लिए गेट बन गया है। रिपोर्ट चैंकाने वाली है कि अधिकांश बच्चे दस से 14 साल के हैं। यदि नियमों पर गौर करें तो दस साल से अधिक उम्र के बच्चों को चाइल्ड हेल्पलाइन को किसी रिहेब सेंटर में नहीं भेजने का नि र्देश है। उन्हें सीधे बाल सुधार गृह भेजा जाता है जहां से वो अपराध की दुनिया का रुख कर लेते हैं। देश में एक करोड़ भिखारी हैं और इनमें से लगभग आधे बच्चे हैं। बच्चों की आड़ में भीख का धंधा चमकता है। समाज और सरकार इस मूल में नहीं जाता कि आखिर समस्या की जड़ है कहां? सरकार यह प्रयास नहीं करती कि बच्चे को गोद लेने के नियमों में ढील दी जाए और समाज यह नहीं सोचता कि सड़क पर जो लड़का या लड़की आज भीख मांग रहे हैं वो कल अच्छे नागरिक होंगे भी या नहीं।

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