हैल्थ इंडिया

महकमा-ए-सेहत में कैसे हो सुधार जब ऐसे हैं हालात?

देवभूमि में स्वास्थ्य सेवाओं को चाहिए संजीवनी

’विचार एक नई सोच’

महकमा-ए-सेहत में कैसे हो सुधार जब ऐसे हैं हालात?

देवभूमि में स्वास्थ्य सेवाओं को चाहिए संजीवनी

राकेश बिजल्वाण

आज अपने नैनीताल-हल्द्वानी प्रवास के दौरान अपने बडे भाई दून मेडिकल कॉलेज के सीनियर फिजिशियन और प्रान्तीय चिकित्सा सेवा संघ के पूर्व अध्य्ाक्ष डॉ एसडी जोशी के साथ सोबन सिंह जीना बेस चिकित्सालय, हल्द्वानी में जाना हुआ। गेट के अंदर घुसते ही लगा कि हल्द्वानी बेस अस्पताल की हालत भी बिल्कुल अपने दून मेडिकल अस्पताल की तरह ही देखने को मिली। इस अस्पताल पर भी मरीजों का भारी दबाव है। लंबी-लंबी लाइनों में डाॅक्टरों के केबिन के बाहर अपनी बारी का इंतजार करते मरीज। सभी डॉक्टर अपने-अपने केबिन में पूरी ईमानदारी के साथ मरीजों को देख रहे हैं। मालूम हुआ कि हल्की बारिश की वजह से अस्पताल में मरीज अन्य दिनों के मुकाबले कम हैं। जितनी देर डाॅक्टर एसडी जोशी अपने मित्र और सीनियर रेडियोलाॅजिस्ट डाॅ विपिन पंत से मिले उतनी देर मैने भी कुछ मरीजों से बात की, और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उनके विचार जानने की कोशिश की। अधिकांश मरीजों ने अस्पताल में डॉक्टरों की कमी की बात कही। नैनीताल से अपनी पत्नी के ईलाज के लिए हल्द्वानी अस्पताल पहुंचे सोहन ने कहा कि भाजपा सरकार के आने के बाद हालत में थोड़ा सुधार तो हुआ है, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत में भी सुधार होना चाहिए। ताकि जुखांम-बुखार की दवाई के लिए भी इतना लम्बा सफर तय न करना पड़े। लालकुआं से आये अशरफ ने कहा कि अस्पताल में बड़ी संख्या में लोग आते हैं इसलिए डाॅक्टर बढाये जाने चाहिए, डाॅक्टरों की कमी के कारण मरीजों को परेशानी होती है। बिन्दुखता से आई रेशमा ने भी डाॅक्टरों की कमी की बात कही। एक बात गौर करने वाली थी कि इस अस्पताल में उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के साथ ही बड़ी संख्या में मरीज पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से लगते हुए इलाकों से आये थे।
मरीजों से बातचीत में पता चला कि अस्पताल में लम्बे समय से हार्ट यूनिट बंद पड़ी है। जिस वजह से हृदय रोगी (हार्ट पेशेंट) बहुत परेशान हैं। थोड़ा जानकारी जुटाई तो पता चला कि मई 2011 के लगभग से यह बंद पड़ी है। यहां हार्ट के डॉक्टर की डिमांड लंब समय से है लेकिन लगभग 07 साल बाद भी इस विषय में कोई सुनवाई नहीं हुई। हार्ट डिपार्टमेंट में लगे हुए ताले पिछले 07 साल से अपने खुलने का इंतजार कर रहें हैं। मजबूरी में हार्ट रोगियों को प्राइवेट अस्पताल का रूख करना पड़ता है।


इस दौरान सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर मेरी बातचीत हुई दून मेडिकल कॉलेज के सीनियर फिजिशियन और प्रान्तीय चिकित्सा सेवा संघ के पूर्व अध्य्ाक्ष डॉ एसडी जोशी, डॉ विपिन पंत, सीनियर रेडियोलॉजिस्ट, बेस चिकित्सालय, हल्द्वानी डॉ अमित रौतेला सीनियर फिजिशियन, डॉ चन्द्रशेखर भट्ट, सीनियर फिजिशियन बेस चिकित्सालय हल्द्वानी, व कई साल पहले सरकारी स्वास्थ्य सेवा को अलविदा कह चुके डॉ नीलाम्बर भट्ट के साथ ही कई अन्य चिकित्सकों से बात हुई। सभी ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार को लेकर कई अहम सुझाव दिए। सभी की अलग-अलग प्रतिक्रिया जल्द आपके सामने रखूंगा, लेकिन जो निचोड़ था वह यह कि सरकारी अस्पतालों में भीड़ होना, बेड और स्ट्रेचर की कमी होना और डॉक्टर व अन्य कर्मचारियों, नर्स, तकनीशियन आदि की कमी होना आम बात है, लेकिन आज भी प्रदेश के अधिकतर लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा कोई चारा है नहीं। निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और मेडिकल रिसर्च सेंटर हर छोटे-बड़े शहरों और कस्बों में हर गली में खुले हैं लेकिन वहां की हालत भी और खराब है। न डॉक्टर हैं और न प्रशिक्षित स्टाफ, किसी भी मरीज की हालत जरा भी बिगड़ने पर वे उन्हें नजदीक के सरकारी अस्पताल में ही भेजने की सलाह देते हैं। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर बड़ी संख्या में मरीज देखना और संसाधनों की कमी का होना एक बड़ा दबाव है। सरकारी सुविधाएं दे तो डाॅक्टरों का पहाड़ चढ़ना कभी मुद्दा नहीं बनेगा।

हल्द्वानी बेस अस्पताल सहित प्रदेश के कई अस्पतालों में लाखों रूपयों के लागत से खरीदी गई मंहगी-महंगी मशीने तकनीश्यिनों के अभाव में धूल फांक रही है। कई अस्पतालों में सर्जन हैं तो नशे का डाॅक्टर यानि एनेस्थिेटिक नहीं है। अस्पतालों में कुछ न कुछ तकनीकी समस्याएं बनी हुई है। जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। डाॅक्टरों ने खुशी जताई की त्रिवेन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए काम करना चाहती है और लगातार इस ओर प्रयासरत है। डाॅक्टरों के मुताबिक राज्य की सभी चिकित्सा इकाइयाँ जैसे ग्राम स्तर पर ए.एन.एम. सेंटर, विकास खंड स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला पुरुष तथा महिला चिकित्सालय, बेस चिकित्सालय, मेडिकल कॉलेज के चिकित्सालय की हालत हर प्रकार से बहुत खराब है। राज्य के इन अस्पतालों में एमबीबीएस डाक्टरों के स्वीकृत पदों के सापेक्ष्य लगभग 50 प्रतिशत से भी ज्यादा पद रिक्त हैं। इसी तरह विशेषज्ञ डाक्टरों के तो 70 प्रतिशत से ज्यादा पद रिक्त हैं जिसमे स्त्री तथा प्रसूति रोग विशेषज्ञ जो ज्यादातर महिला चिकित्सक होती हैं, का घनघोर अभाव है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में किस तरह हो सकता है सुधार। आपका का क्या सोचना है?
आखिर समस्या है कहां और इसका समाधान कहां है?
क्या डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे प्रदेश के सामने इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है?
क्या सरकारी अस्पताल ऐसे ही भीड़, धक्कामुक्की, बदइंतजामी, बेड की कमी, दवाओं की कमी, दवाओं की कालाबाजारी, समय से इस्तेमाल में न लाए जाने के कारण दवाओं और उपकरणों के बर्बाद हो जाने की खबरों के कारण चर्चा में रहेंगे? क्या उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र रावत के नेतृत्व वाली प्रचंड बहुमत की आने वाले समय में सरकार बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं की सफल सर्जरी कर पायेगी?

’विचार एक नई सोच’

 

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