स्किल इंडिया

अपने घर-गाँव में रहते हुए स्वरोजगार का बेहत्तर जरिया

मधुमखी पालन, मशरूम, और बागवानी, की खेती

अपने घर-गाँव में रहते हुए स्वरोजगार का बेहत्तर जरिया

मधुमखी पालन, मशरूम, और बागवानी, की खेती

देहरादून।    स्वरोजगार आज आजीविका कमाने का प्रमुख साधन बन चुका है। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, लगातार स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली योजनाओं पर बल दे रही हैं। इन्हीं स्वरोजगार योजनाओं में मशरूम बागवानी, मधुमखी पालन एक है। उत्तराखंड सरकार रिर्वस पलायन के साथ ही बेरोजगारों से अपील कर रही है िक वह अपने घर-गाँव में रहते हुए स्वरोजगार करे। कृषि विभाग उत्तराखंड की विभिन्न योजनायें और अनुदान आपको बागवानी के अलावा खाद्य प्रसंस्करण, मशरुम उत्पादन, बेमौसमी फल सब्जी उत्पादन, ग्रीन हाउस, पॉवर मशीन, मधुमक्खी पालन, जड़ी बूटी उत्पादन आदि में सहत्यता प्रदान करेंगे। यही नहीं बेहत्तर प्रशिक्षण के साथ ही समय-समय पर आपको विशेष़ज्ञों की राय भी प्राप्त होगी।

करें मधु का कारोबार, कम खर्च में बेहत्तर मुनाफा
मधुमक्खी पालन बेरोजगार युवकों के लिए एक अच्छा व्यवसाय है, जिसे रोजगार में शामिल करके अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। शहद (मधु) का प्रयोग सभी त्योहारों, पूजाकर्मों एवं मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक आवश्यक बताया गया है। इसके आलावा इससे पेड़-पौधे के परागण से फसल की पैदावार में वृद्धि होती है। इसके लिए सरकार की तरफ से अनुदान भी मिलता है। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण इसकी मांग सब दिन रहती है लेकिन जाड़े के दिनों में इसकी मांग बढ़ जाती है और उत्पादन भी अधिक होता है। विशेषज्ञांे की माने तो जाड़े के चार महीने में एक बक्से से 20-25 किलो मधु निकलता है जबकि आठ महीने मधु का उत्पादन नहीं होता है। फूल नहीं रहने के कारण इस दौरान मधुमक्खियों को चीनी खिलाना पड़ता है। मधुमक्खी फूल खिलने के दिनों यानि दिसंबर से मार्च यानि चार माह का समय सबसे अच्छा होता है, बाकी के आठ माह इन्हें सिर्फ पालना होता है, जिसमें मामूली खर्च है। इसमें एक साल में एक डब्बा की मधुमक्खी के पालन में तीन किलो चीनी खर्च आती है जो मामूली है। जबकि दिसंबर से मार्च तक में प्रत्येक चार दिनों पर 20 से 25 किलो शहद निकाला जाता है जो कम से कम रेट यानि 80 रूपए किलो पर भी बेचने पर भारी मुनाफा है। अगर 50 बक्सा मधुमक्खी पालन किया जाय तो छह लाख रूपए की आमदनी होती है। शहद निकालने के लिए मशीन का उपयोग होता है। जिससे कोई परेशानी नहीं होती है।

मशरूम ग्रामीण युवाओं का अपना रोजगार
मशरूम का उत्पादन ग्रामीण युवाओं के लिए एक अच्छा व्यवसाय साबित हो रहा है। मशरूम सेहत का रखवाला है, इसलिए मांग बढ़ रही है, पर आपूर्ति उतनी नहीं हो रही। ऐसे में यह व्यवसाय फायदे का सौदा है। इसे गांवों में छतरी व कुकुरमुत्ता आदि नामों से जाना जाता है। डॉक्टर और डाइटीशियन मोटापा, हार्ट-डिजीज और डायबिटीज के रोगियों को इसका सेवन करने की सलाह देते हैं। इसका चलन निरंतर बढ़ता जा रहा है। अब गांव ही नहीं, शहरों में भी शिक्षित युवा मशरूम उत्पादन को करियर के रूप में अपनाने लगे हैं। मशरूम की खेती को छोटी जगह और कम लागत में शुरू किया जा सकता है और लागत की तुलना में मुनाफा कई गुना ज्यादा होता है। बेरोजगार युवकों के लिए स्वरोजगार के नजरिए से भी यह सेक्टर फायदेमंद साबित हो सकता है।

फल और सब्जियों से मुनाफे की फसल
किसानों को बागवानी खेती की तरफ आकर्षित करने के लिए विभाग किसानों को प्रोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। किसान बागवानी खेती के साथ-साथ टमाटर, बैंगन आदि सब्जी की खेती लेकर दोहरा लाभ ले रहे है। बागवानी खेती से किसान बागवानी जैसे मौसमी, किन्यू, निंबू आदि का बाग उगाकर फलों की खेती लेते ही है साथ में सब्जी की नकद आमदनी की खेती कर अच्छा खासा कमा सकते हैं। पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर जिन किसानों ने सब्जियों, फलों और मसालों की खेती शुरु की है, उनकी आमदनी तेजी से बढ़ी है। मैदानी जिलों के किसान मसालों की खेती में भी अच्छा मुनाफा कमा रहें हैं। हल्दी, धनिया, मिर्च, मेथी आदि की विशेष तौर पर खेती की जा रही है। मसालों के उत्पादन में भी बढ़ोतरी देखी गई है।

कुषि मंत्री सुवोध उनियाल का कहना है कि उत्तराखंड में किसानों को बागवानी के लिए बढ़ावा देने के उद्देश्य से पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक खेती के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। किसानों को नई तकनीकों की जानकारी के साथ उन्हें खेती के नए उपकरणों के उपयोग करने के सही तरीके का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close
Close