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मैंने तो अपने जन्मदिन पर एक पेड़ लगाया और आपने

अपने जन्मदिन के दिन एक पेड़ आप भी लगांए

मैंने तो अपने जन्मदिन पर एक पेड़ लगाया और आपने

अपने जन्मदिन के दिन एक पेड़ आप भी लगांए

दीपक जुगराण
   दीपक जुगराण

यह कोई खबर नहीं बल्कि मेरे दिल के जज्बात हैं। जिनको आज मैनें शब्दों में उकेरने की कोशिश की है। न मैं केाई लेखक हूं और न ही कोई पत्रकार। बस लिखने का मन किया और थोड़ा बहुत लिख दिया। आज मेरे बड़े भाई राकेश बिजल्वाण जी का जन्मदिन है। ईश्वर उनको दीर्धआयु और जीवन में हमेशा खुशहाली दे। राकेश बिजल्वाण मेरे बड़े भाई ही नहीं बल्कि मेरे प्रेरणास्रोत भी हैं। आज से लगभग 15 साल पहले मेरी उनसे मुलाकात हुई। पहली मुलाकात में ही ऐसा लगा न जाने इनको कब से जानता हूं। बहुत ही सौम्य, मिलनसार और दूसरों की मद्द को हमेशा तैयार रहने वाला एक शख्स। जिसकी ख्वाहिस थी जीवन में सफलता का वह मुकाम हासिल करना, जिसके बाद उन्हें आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर लोगों की मद्द के लिए किसी रसूखदार के आगे हाथ न फैलाना पड़े। आज उनका वह सपना जीतोड़ मेहनत और लगन के बल पर सफल हो रहा है। हम दोनों अलग-अलग फार्मा कम्पनी में थे। धीरे-धीरे मुलाकातें दोस्ती में बदली और दोस्ती से शुरू हुई हमारी अपनी कम्पनी डीआर फार्मा की सफर। लेकिन यह सफर इतना आसान नहीं था। इन 15 सालों में हमने जिंदगी के बहुत से उतार चढ़ाव देखे, एक वो वक्त भी देखा जब पानी पीकर ही पेट की भूख शांत करनी पढ़ती थी। लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी, राकेश भाई हमेशा मेरी हिम्मत बढ़ाया करते थे कि एक दिन हम जरूर कामयाब होंगे।

हमारी मंजिल की डगर बहुत कठिन थी। हम दोनों के परिवार भी आर्थिक रूप से कमजोर थे। जो करना था खुद से करना था। मंजिल की तरफ पैदल शुरू हुआ हमारा सफर साईकिल, फिर स्कूटर से होता हुआ अब कार तक आ पहुंचा है और ये सब संभव हो पाया ईमानदारी, मेहनत, लगन और एक-दूसरे पर अटूट विश्वास की वजह से। 15 साल में हम दोनों के जीवन में बहुत से उतार चढाव आये, लेकिन हमने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मुसीबतों से घबराये नहीं बल्कि उनका डटकर सामना किया और मंजिल तक पहुंचे। आज भी हम उसी ईमानदारी, मेहनत, लगन और समर्पण से काम करते हैं। हमारी इस कामयाबी में राकेश भाई का योगदान अतुलनीय है।

राकेश भाई के बारे में बात करूं तो उनका जीवन हमेशा से सामजिक सरोकारों के लिए समर्पित रहा है। अपने जीवन में राकेश भाई ने रक्तदान महादान के वाक्य को संकल्प के तौर पर लिया है। वह आमतौर पर तो रक्तदान करते ही हैं लेकिन जबकभी भी किसी को खून की जरूरत होती है तो वह सबसे आगे खड़े नजर आते हैं। यहीं नहीं लम्बे समय से वह फार्मा के लोगों के साथ ही अन्य लोगों को भी रक्तदान करने को लिए जागरूक करते रहते हैं। कंपनी के कार्यों के सिलसिले में वह उत्तराखंड के जिन भी स्थानों में जाते हैं वहां रक्तदान को लेकर लोगों को जागरूक करते हैं। यही नहीं रक्तदान के अलावा समाज के निर्बल वर्ग की मद्द को भी हमेशा वह आगे रहते हैं। दिखावे से दूर रहने वाले राकेश भाई स्वच्छता अभियान से लेकर वृक्षा रोपण को बढ़वा देने को लेकर पिछले कई सालों से लगातार कार्य कर रहे हैं। उनका अभियान भले ही अभी छोटे स्तर पर हो लेकिन उनकी कोशिश ईमानदार है। मेरा स्पष्ट रूप से यह कहना है कि जो ईमानदार कोशिशें हमेशा सार्थक परिणाम की राह सामने लेकर आती हैं। जन्मदिन के मौके पर जब आज राकेश भाई से मेरे बात हुई तो उन्होने कहा कि वह अपना शेष जीवन समाजसेवा और पर्यायवरण रक्षा को समर्पित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश रहेगी कि सर्वप्रथर्म उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में जहां स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है वहां पर समय-समय पर अपने स्तर से स्वास्थ्य कैंप का आयोजन कर सकूं। ताकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को कुछ मद्द मिल सके।

राकेश भाई कहते हैं कि पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार के भरोसे पर रहने के बजाय जनता को जागरूक होना होगा। इस लिए मेरा निवेदन है कि यदि अपने जन्म दिन या विशिष्ठ अवसरों पर वृक्ष लगाने की भावना को जागृत किया जाय। साथ ही किसी एक वृक्ष का उत्तरदायित्व यदि एक परिवार ले सके तो निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान होगा। इसी प्रकार किसी की मृत्यु के पश्चात भी उसकी स्मृति में पेड़ लगाने का निश्चय हम लें और उसकी देख भाल परिवार के सदस्य के रूप में करें। उपहार आदि देने में भी परिस्थिति के अनुसार पेड पौधे उपहार में दे। और इस अभियान से जुड़े रहें और उसका परिणाम सामने अवश्य आएगा। स्कूल्स आदि में यद्यपि पर्यावरण को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का कार्य किया गया है। परन्तु स्कूल्स में अध्यापक तथा विद्यार्थी सभी उसको मात्र औपचारिकता समझते हैं। इसी प्रकार खानापूर्ति के लिए कभी कभी माननीयों द्वारा भी वृक्षारोपण किया जाता है,परन्तु शायद कुछ दिन बाद ही पौधा कूड़े में ढूँढने से भी नहीं मिलता। इसी प्रकार “राष्ट्रीय सेवा योजना” आदि के शिविरों में भी वृक्षारोपण कार्यक्रम को कभी कभी सम्मिलित किया जाता है,परन्तु लगाने के बाद उसकी देखभाल का उत्तरदायित्व किसी का नहीं होता। अतः पौधे लगाने के कार्यक्रम में व्यय हुआ धन व्यर्थ हो जाता है। इस लिए समाज की जागरूकता से ही पर्यावरण संरक्षण संभव है। राकेश भाई की बातें सुनकर मुझे खुद पर गर्भ की अनुभूति हुई कि आज जहां इस भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास खुद के लिए समय नहीं है वहीं एक व्यक्ति निस्वार्थ भाव से समाजसेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यकर रहा है।

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