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चला भुलों बम्बई कौथिग देख्योला, बांधु का लस्का डस्का देख्योला

कौथिग मुम्बई : ताकि जड़ों से उखड़ें नहीं

चला भुलों बम्बई कौथिग देख्योला, बांधु का लस्का डस्का देख्योला

कौथिग मुम्बई: ताकि जड़ों से उखड़ें नहीं

देहरादून।  पहाड़ की रस्याण, लोकसंस्कृति, और रीति-रिवाजों का परिचायक ‘कौथिग‘। इस बार मुझे भी मौका मिल रहा है मुम्बई कौथिग में शामिल होने का, और यह सब संभव हो पाया उत्तराखंड ही नहीं देश के बरिष्ठ पत्रकारों में गिने जाने वाले और मेरे बड़े भाई अरूण शर्मा जी के कारण। संयोग कुछ ऐसा बना कि इस बार जब मुम्बई कौथिग के मुख्य आयोजक और बरिष्ठ पत्रकार भाई केशर सिंह बिष्ट देहरादून आये तो अरूण भाई जी के साथ उनको मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चाय की चुस्कियों के साथ ही केशर भाई जी और उनकी टीम के साथ उत्तराखंड और प्रवासी उत्तराखंडियों के साथ ही आगामी अप्रैल माह में देहरादून में भी मुम्बई की तर्ज पर आयोजित होने वाले ‘कौथिग‘ पर लम्बी चर्चा हुई। विदा होते समय भाई केशर सिंह बिष्ट ने मुम्बई कौथिग में शामिल होने के लिए निमत्रण पत्र दिया और साथ में एक वादा लिया कि आपको और आपकी टीम को इस बार मुम्बई कौथिग में शामिल होने जरूर आना है। मैने भी वादा किया कि मैं अपनी टीम के साथ जरूर आउंगा। उसी वादे को निभाने में अपनी विचार एक नई सोच सामाजिक संस्था की टीम जिसमें बड़े भाई अरूण जी के नेतृत्व में दीपक जुगराण, अरूण चमोली, रवि चमोली, हरीश चैहान, हरीश बिजल्वाण, डाॅ अमित रौतेला, अरूण पांडेय, जितेन्द्र बिष्ट और अवधेश नौटियाल शामिल हैं के साथ जा रहा हूं। शुक्रिया केशर भाई आपके स्नेह पूर्वक दिए गए निमत्रण पत्र का। अगर आपको भी देवभूमि की लोकसंस्कृति के जींवत दर्शन करने हो तो चले आइये मुम्बई ‘कौथिग‘ में।

उत्तराखंड की महान विभूतियों को समर्पित कौथिग-2018
कौथिग के संयोजक व वरिष्ठ पत्रकार केशर सिंह बिष्ट ने बताया कि नवी मुंबई में 28 जनवरी तक चलने वाले प्रवासी उत्तराखंडियों के सांस्कृति उत्सव कौथिग के 11वें साल को इस बार उत्तराखंड की महान विभूतियों को समर्पित किया गया है। लोक गायक चंद्रसिंह राही, जनकवि व गायक गिरीश तिवारी गिर्दा, कार्टूनिस्ट बी मोहन नेगी, इतिहासकार शेर सिंह पांगती, फोटोग्राफर कमल जोशी और लेखक रतन सिंह जौनसारी के अलावा मुंबई से प्रवासियों की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को नए आयाम देने वाले स्वर्गीय डी राम, अर्जुनसिंह गुसाईं, भगतसिंह शाह, गौरीदत्त बिनवाल, देवी बिष्ट आदि के नाम प्रमुख हैं।

मायानगरी में देवभूमि की लोकसंस्कृति की धमक
19 जनवरी शुक्रवार को नवी मुंबई में प्रवासी उत्तराखंडियों के सामाजिक संगठन कौथिग फाउंडेशन द्वारा आयोजित कौथिग 2018 महोत्सव का शाम सात बजे रामलीला मैदान में भव्य आगाज हुआ। कौथिग मंच पर 11 साल की पहली प्रस्तुति लोकप्रिय गायक सुरेश काला के जय बद्री केदारनाथ की हुई। इससे पहले कौथिग की शुरुआत मां नंदादेवी राजजात की शोभायात्रा निकाली गई। मां नंदादेवी राजजात की शोभा यात्रा नवी मुंबई के नेरूल स्थित गांवदेवी मंदिर से प्रारंभ हुई। शोभा यात्रा में छलिया कलाकारों के पथ नृत्य, ढोल-नगाड़ों, रणसिंगा की गूंज से नेरूल का कौथिग प्रांगण गुंजायमान हो उठा। पिथौरागढ़ से आए मशहूर छलिया कलाकारों ने रंगा-रंग पथनृत्य कर दर्शकों की वाहवाही बटोरी। कौथिग महोत्सव में गढ़वाली, जौनसारी और कुमाऊनी कलाकारों के लगभग 200 कलाकार लगातार 10 दिन अपनी प्रस्तुति देंगे।

कौथिग में दिखेगा पलायन का दर्द
कौथिग फाउंडेशन ने इस बार मंच को गांव को संवारें की थीम पर तैयार किया है, जिसके माध्यम से पलायन के कारण खंडहर हो चुके पुराने घर और खाली हो चुके गांवों पर प्रवासियों का ध्यान दिलाने की कोशिश की गई है। कौथिग मैदान में मुख्य प्रवेशद्वार पर मुंबई के प्रतीक गेट वे आफ इंडिया की प्रतिकृति बनाई गई है लेकिन, सामने बना मंच गांव के घर जैसा दिखेगा। मंच और प्रवेश द्वार में कर्मभूमि और जन्मभूमि को समाहित किया गया है।

पहाड़ के अनोखे हस्तशिल्प और खाद्य उत्पादों से सजे स्टाल
कौथिग महोत्सव में इस बार पहाड़ का माल्टा, बुरांश-खुमानी, पुदीना और शुद्ध जूस जैसे कई पेय पदार्थों के स्टाल भी मेले में लगे हैं। पहाड़ की खेती में पैदा होने वाले सैकड़ों खाद्य उत्पाद कोदा-झंगोरा, राजमा, गहथ, भट्ट, भंगजीर आदि इस बार काफी मात्रा में कौथिग महोत्सव में उपल्बध है। कौथिग में पहाड़ के अनोखे हस्तशिल्प के भी कई स्टाल लग रहे हैं।

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