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पद्म श्री मुरूगनाथम पर गर्व है हिन्दुस्तान को

माहवारी के मुद्दे पर क्रांति लाने वाले ‘पैडमैन’

पद्म श्री मुरूगनाथम पर गर्व है हिन्दुस्तान को

माहवारी के मुद्दे पर क्रांति लाने वाले पद्म श्री मुरूगनाथम

देहरादून। ‘पैडमैन’ फिल्म उस मुद्दे को उठा रही है, जिसके बारे में हमारे देश में लोग खुलकर बात तक नहीं करते हैं। इस फिल्म की कहानी महिलाओं की माहवारी (पीरियड्स) के दिनों में स्वच्छता के इर्द गिर्द घूमती है। कहानी सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति की लगन और बदलाव लाने के लिए की गई बड़ी कोशिश को दर्शाती है। ‘पैडमैन’ फिल्म तमिलनाडु के रहने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथम की जिंदगी पर आधारित है। इसमें मुरुगनाथम की सच्ची कोशिश और कुछ करने की शिद्दत को दिखाया गया है। आज उस इंसान के बारे में भी जान लीजिए जिसने एक छोटे से गांव में रहकर भी हिंदुस्तान में इस मुद्दे को लेकर क्रांति ला दी और देश ही नहीं दुनियाभर में ‘पैडमैन’ के नाम से मशहूर हो गए। मुरुगनाथम का जन्म 1962 में तमिलनाडु के कोयंबटूर में हुआ। पिता का निधन सड़क हादसे में होने की वजह से उन्हें गरीबी में बचपन गुजारना पड़ा। मां खेतों में काम करके गुजारा चलाती थीं। 14 साल की उम्र में उनका स्कूल भी छूट गया। उसके बाद उन्होंने कई तरह के काम किए ताकि परिवार को मदद कर सकें। अरुणाचलम की 1998 में शांति से शादी हो गई। लेकिन उन्होंने एक दिन देखा कि उनकी पत्नी पीरियड्स के दौरान गंदे कपड़ों और अखबार का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि सैनिटरी पैड महंगे आते थे। बस इसके बाद अरुणाचलम इस समस्या से निबटने के लिए जुट गए।

सैनिटरी पैड का परीक्षण खुद पर किया

मुरुगनाथम ने सबसे पहले कॉटन का इस्तेमाल करके पैड बनाने शुरू किए। उनकी पत्नी और बहन ने इसे सिरे से नकार दिया। दोनों ने अरुणाचलम का साथ देने से भी साफ इनकार कर दिया। उन्हें इस काम के लिए कोई वॉलंटियर भी नहीं मिली तो उन्होंने सैनिटरी पैड का परीक्षण खुद पर ही करना शुरू कर दिया। हालांकि गांव के लोगों ने उनका विरोध किया। मुरुगनाथम को यह बात जानने में दो साल का समय लग गया कि कॉमर्शियल पैड सेल्यूलोज से बने होते हैं, लेकिन इसे बनाने वाली मशीन बहुत महंगी थी इसलिए उन्होंने खुद मशीन बनाने का इरादा बनाया और 65,000 रु. की मशीन तैयार कर दी। उन्होंने इसका इस्तेमाल पैड बनाने के लिए किया। मुरुगनाथम के इस प्रयोग को दुनियाभर में पहचाना गया और कई औरतों की जिंदगी को बदलने में इसने अहम भूमिका निभाई। उनसे कई अन्य उद्यमियों ने भी प्रेरणा ली। उनकी ये मिनी मशीन 29 में से 23 राज्यों में लगाई गई हैं और ये पैड बाजार में मिलने वाले सैनिटरी पैड की एक तिहाई कीमत पर ले जाते हैं। वे अपने इस प्रोजेक्ट को 106 देशों तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।

फुटबॉल को गर्भाशय के रूप में अपने पेट पर बाँधा

आपको बता दें कि उन्होंने अपनी पत्नी ही नहीं बल्कि मेडिकल छात्रों के साथ भी तरह तरह की जांचे की जिस वजह से ये अफवाह भी फैली की इनके मेडिकल छात्राओं से सम्बन्ध हैं और इसी वजह से इनकी पत्नी ने इन्हे डाइवोर्स दे दिया। पर उन्होंने हार नहीं मानी और गाँव औरों को ही रोजगार देकर उनके लिए ही पैड्स बनवाये। उन्होंने इसकी जांच के लिए एक फुटबॉल को गर्भाशय के रूप में अपने पेट पर बाँध उसमे जानवर का खून भरकर और उससे एक पाइप जोड़ साइकिल चला कर ये चेक किया की खून का प्रवाह कैसे और कितना होता है। उनकी कामयाबी के बाद बिलगेट्स ने उन्हें यूएसए में एक स्पीच देने के लिए आमंत्रित भी किया और स्पीच के बाद उनके दुनिया को देखने के नजरिये को सराहा भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इनसे मुलाकात की। आज भारत को इनपर गर्व है।

आखिरकार साढ़े चार साल बाद अपनी कोशिश में कामयाब हुए

मां ने छोड़ा, पत्नी ने छोड़ा, पर मुरुगनाथम ने सैनिटरी पैड्स बनाने का सपना नहीं छोड़ा शुरुआत में मुरुगनाथम ने कॉटन के सैनिटरी पैड्स बनाए, लेकिन उनकी पत्नी और बहनों ने उसे रिजेक्ट कर दिया। यही नहीं उन्होंने खुद पर एक्सपेरिमेंट करने से भी मना कर दिया। जिसके बाद उन्होंने गांव की दूसरी लड़कियों को टेस्ट के लिए मनाने की कोशिश भी की, लेकिन बात नहीं बनी। पैड्स बनाने में 10 पैसे का मैटीरियल इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन अंत में प्रोडक्ट 40 गुना ज्यादा दाम में बिकता था। यही सोचकर मुरुगनाथम ने सस्ते पैड्स के आविष्कार की ठान ली। कई जगह कोशिश करने पर भी जब मुरुगनाथम को अपने पैड्स के टेस्ट के लिए कोई नहीं मिला तब उन्होंने खुद ही पैड्स पहनकर उनका टेस्ट शुरू कर दिया। जिस पत्नी के लिए वो इतनी बड़ी रिसर्च में लगे हुए थे वो 18 महीनों के बाद उन्हें छोड़ गईं। कुछ दिनों बाद मुरुगनाथम के अनोखे टेस्ट से तंग आकर उनकी मां ने भी उन्हें छोड़ दिया था। मुरुगनाथम को पागल समझकर गांव वालों ने भी उनका बहिष्कार कर दिया। दो सालों की मेहनत के बाद उन्हें ये पता चल पाया कि पैड्स आखिर किस मैटीरियल से बनते हैं। रिसर्च शुरू करने के साढ़े चार साल बाद आखिरकार वो अपनी कोशिश में कामयाब हुए और सस्ते सैनिटरी पैड्स बनाने की तकनीक उनके हाथ लगी। आज मुरुगनाथम जयाश्री इंडस्ट्रीज के मालिक हैं, जो देशभर के गांव में सस्ते सैनिटरी पैड्स पहुंचाती हैं। करीब साढ़े पांच सालों के बाद पत्नी ने उन्हें कॉल किया। आज मुरुगनाथम के पास भारत की सबसे सस्ती सैनिटरी पैड्स की मशीन का पेटेंट है।

इन पुरस्कारों से नवाजें जा चुके हैं

साल 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने मुरुगनाथम को नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड से नवाजा। साल 2014 में दुनिया की मशहूर मैगजीन ‘टाइम’ ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शामिल किया। इन सबके अलावा मुरुगनाथम को साल 2016 में भारत सरकार ने पद्म श्री से भी सम्मानित किया। इन सम्मानों के बाद अब उनकी लाइफ पर बॉलीवुड में बायोपिक बन गई है।

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