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मुंबई की इन गुफाओं में रहे थे पांडव ?

अजन्ता और एल्लोरा की गुफाओं सरीखा है एलिफेंटा का इतिहास!

मुंबई की इन गुफाओं में रहे थे पांडव ?

अजन्ता और एल्लोरा की गुफाओं सरीखा है एलिफेंटा का इतिहास!

मुबंई। अगर आप मुंबई की यात्रा पर आऐं हैं तो समय निकालकर ऐतिहासिक एलिफेंटा की गुफाएँ देखने जरूर जायें। एलिफेंटा की गुफाएँ मुम्बई महानगर के पास स्थित पर्यटकों का एक बड़ा आकर्षण केन्द्र हैं। एलिफेंटा की गुफाएं अजन्ता और एल्लोरा की गुफाओं की तरह ही एक ऐतिहासिक गुफाओं का समूह है जो मुंबई बंदरगाह से महज करीब 12 किमी दूर पूर्व में स्थित है। इसे एलिफेंटा आइलैंड या घारापुरी (शाब्दिक रूप से “गुफाओं का शहर”) के नाम से जानते है। एलिफेंटा की गुफाएं पौराणिक देवताओं की भव्य मूर्तियों के लिए विख्यात है। एलिफेंटा की गुफाएं अपनी अति सुंदर मूर्तियों के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। इन मूर्तियों में शिव की त्रिमूर्ति की मूर्ति सर्वाधिक लोकप्रिय है। एलिफेंटा की 07 गुफाओं में सबसे महत्वपूर्ण है महेश मूर्ति गुफा।

हिन्दू और बौद्ध धर्म की झलक
एलिफेंटा की गुफाएं गुफाओं का एक समूह है जो कि एलिफेंटा द्वीप पर स्थित है। बड़ी संख्या में सैलानी यहां घुमने नवंबर से लेकर मार्च के महीने में घूमने जाते हैं। एलिफेंटा के गुहा मन्दिर राष्ट्रकूटों के समय में बने। 6000 वर्ग फीट के क्षेत्रफल में फैली हुई इन गुफाओं में हिन्दू और बौद्ध धर्म की झलक दिखाई देती है। एलिफेन्टा की पहाड़ी में शैलोत्कीर्ण करके उमा महेश गुहा मन्दिर का निर्माण लगभग 8वीं शताब्दी में किया गया। एलेफेंटा की गुफाएं में पांच हिन्दू गुफाओं का एक बड़ा समूह है जिसमें भगवान् शिव से जुडी ऐतिहासिक मूर्तियाँ मिलती है और दूसरा समूह अपेक्षाकृत छोटा है जिसमे 2 गुफाओं का समूह है जिसमे बौद्ध धर्म और उनके अगुओं से जुडी कुछ कलाकृतियाँ मिलती है।

पुर्तगाल और कोंकण मौर्यों से भी संबध!
मुख्य गुफा यानि सबसे बड़ी गुफा 1534 तक पुर्तगाल के शासन के समय तक हिन्दू लोगो के पूजा अर्चना करने की जगह थी। लेकिन 1534 के बाद गुफा को काफी क्षति पहुंची। जिसकी बाद 1970 में इसकी दोबारा मरम्मत की गयी थी और 1987 में युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट ने इसे डिजाइन भी किया था। गुफाओ में बनी ये मूर्तियाँ तकरीबन 5 से 8 वी शताब्दी में बनायी गयी थी, लेकिन आज भी इसे किसने बनाया इस पर बहस शुरू हैं। गुफाओं को असिताश्म पत्थरो से ही काटा जा सकता है। सभी गुफाओं को प्राचीन समय में ही रंग दिया गया था लेकिन अभी केवल उसके कुछ अवशेष ही बचे हुए है। इतिहास की बात करें तो 635 ईस्वी में, नौसैनिक युद्ध में बादामी चालुकस सम्राट पुल्केसी द्वितीय ने कोंकण के मौर्य शासकों को हराया था, और ऐसा माना जाता है कि उस समय में एलिफेंटा को पुरी या पुरिका कहा जाता था जो कोंकण मोर्यों के लिए राजधानी की तरह था। हालाँकि कुछ इतिहासकार यह कहते है कि इनका निर्माण कोंकण मौर्यों ने ही किया है लेकिन इस दावे का बार-बार खंडन किया है क्योंकि यह मानना जरा मुश्किल है कि कोंकण मौर्यों ने इस तरह के पेचीदा और असाधारण खुदाई वाले काम को अंजाम दिया हो और ना ही वो इस तरह की उच्च गुणवत्ता वाली मूर्तियाँ बनाने का प्रयास कर सकते थे। फिलहाल इसकी देखरेख आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया कर रहा है।

शिव के विभिन्न रूपों केे विराट दर्शन
आपको इन गुफाओं में भगवान शिव के विभिन्न रूपों के दर्शन होंगे। एलिफेंटा की गुफाएँ के पर्वत पर भगवान शिव की मूर्ति भी है। मंदिर में एक बड़ा हॉल है जिसमें भगवान शिव की नौ मूर्तियों के खण्ड विभिन्न मुद्राओं को प्रस्तुत करते हैं। इस गुफा में शिल्प कला के कक्षो में अर्धनारीश्वर, कल्याण सुंदर शिव, रावण द्वारा कैलाश पर्वत को ले जाने, अंधकारी मूर्ति और नटराज शिव की उल्लेखनीय छवियाँ दिखाई गई हैं। एलिफेंटा में भगवान शंकर के कई लीलारूपों की मूर्तिकारी, एलौरा और अजंता की मूर्तिकला के समकक्ष ही है। एलिफेंटा की गुफाएँ में चट्टानों को काट कर मूर्तियाँ बनाई गई है। इतिहासकारों के मुताबिक मौर्य वंश, चालुक्य, सिलहरास, यादव वंश, अहमदाबाद के मुस्लिम राजाओं, पुर्तगालियों, मराठा और अंत में ब्रिटिश शासन के अधीन रह चुका यह द्वीप अपने इतिहास को दर्शाता है। जिसके पहले समूह में पांच हिंदू गुफाएं हैं, जिनमें पत्थरों को काटकर भगवान शिव के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है।

पांडवों ने किया था इन गुफाओं में निवास?
स्थानीय परम्पराएँ यह मानती है कि ये गुफाएं मानवनिर्मित नहीं है और इन्हें बनाने का श्रेय भारतीय महाकाव्य महाभारत के नायकों और बनसुर जो कि शिव का दानव भक्त के रूप में जाना जाता है को सम्मिलित रूप से दिया जाता है। वहीं लोगों का यह भी मानना है कि महाभारत काल में पांडवों ने निवास करने के लिए इस गुफा का निर्माण किया था। हालाँकि यह बात भी आपको ध्यान में होनी चाहिए कि ऐसी किसी भी घटना से जुड़े शिलालेख जो इन गुफाओं के निर्माण से जुडी किसी जानकारी के बारे में बताते हो इस द्वीप पर नहीं मिले है।

गुफाओं का नाम एलिफेंटा कैसे पड़ा?
पुर्तगालियों को इन गुफाओं में हाथियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां मिली थी जिसके बाद उन्होंने इस स्थान का नाम “एलीफेंटा” रख दिया। पुर्तगालियों ने इसका उल्लेख भी किया है। एलिफेंटा पर 16वीं शती में मुम्बई तट पर बसने वाले पुर्तगालियों का अधिकार था। इन कलाशून्य व्यापारियों ने इस द्वीप की सुंदर गुफाओं का गोशालाओं, चारा रखने के गोदामों, यहां तक कि चांदमारी के लिए प्रयोग करके इनका कलावैभव नष्टप्राय कर दिया। 16वीं शती ई. तक राजघाट नामक स्थान पर हाथी की एक विशाल मूर्ति अवस्थित थी। इसी कारण पुर्तगालियों ने द्वीप को एलिफेंटा का नाम दिया था।

समुद्र की लहरें और नाव की सैर
इस गुफा के बाहर बहुत ही मजबूत चट्टान भी है। इसके अलावा यहाँ एक मंदिर भी है जिसके भीतर गुफा बनी हुई है। एलिफेंटा की गुफाएँ से हर 15 मिनट के बाद एक नाव जाती है जो केवल सुबह के नौ बजे से लेकर शाम 05 बजे के बीच ही चलती है। विशाल समुद्र में नाव से सफर का आंनद ही कुछ और है।
एलिफेंटा की गुफाओं में जाने का रास्ता
प्रसिद्धि 1987 में एलिफेंटा की गुफाएँ को विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया गया था।
मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से बोट द्वारा एलीफेंटा की गुफाओं तक पहुंचा जा सकता है। यहां टैक्सी सेवा आसानी से मिल जाती है।
एलीफेंटा की गुफाओं तक फैरी द्वारा पहुंचने के लिए शुल्क लगता है
सोमवार के दिन यहां प्रवेश बंद रहता है
एलीफेंटा की गुफाओं में घूमने का समय सुबह 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक होता है
कब जाएँ…………. नवम्बर से मार्च
कैसे पहुँचें……….. जलयान, हवाई जहाज, रेल, बस आदि से पहुँचा जा सकता है।
हवाई अड्डा…….. छ्त्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र
रेलवे स्टेशन…… छत्रपति शिवाजी टर्मिनस
यातायात.……….. ऑटो-रिक्शा, टैक्सी, सिटी बस
कहाँ ठहरें……… होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
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