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सीएम के गांव खैरासैंण पहुंचे इस रावत की चिट्ठी आपको भावुक कर देगी

चिट्ठी में क्या है ऐसा और बधाई किस बात की दी है सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को?

सीएम के गांव खैरासैंण पहुंचे इस रावत की चिट्ठी आपको भावुक कर देगी

चिट्ठी में क्या है ऐसा और बधाई किस बात की दी है सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को?

देहरादून। घुमक्कड़ी के शौकीन और पलायन एक चिंतन टीम के फांउडर मेम्बर अजय रावत किसी पहचान की मोहताज नहीं है। पहाड़ो से बेहद लगाव रखने वाले अजय रावत प्ररेणा हैं उन लोगों के लिये जो सुख सुविधाओं के अभाव में पलायन कर रहे हैं। पत्रकार, समाजसेवी अजय रावत सोशल मीडिया और प्रिंट व टीवी मीडिया के माध्यम से लगातार लोगों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। पहाड़ो के आम जनमानस को स्वरोजगार के लिये प्रेरित करने वाले अजय रावत से बेहत्तर पहाड़ों के दुखदर्द को कोई नहीं जान सकता है। मुख्यमंत्री के गांव खैरासैंण पहुंचे अजय रावत ने एक भावुक करने वाले चिट्ठी मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नाम लिखी है। आप भी पढ़िये क्या खास है इस चिट्ठी में……………………..

….पाती टीएसआर जी के नाम….
माननीय मुख्यमंत्री श्री Trivendra Singh Rawat जी, सादर नमस्कार।
आज अनायास दंगलेश्वर महादेव से आगे जाना हुआ तो कुछ खट्टे तो कुछ मीठे अहसास हुए, सोचा लगे हाथ एक पाती आपके नाम ही टांग दूं इस मंच पर।
श्रीमान टीएसआर जी, सबसे पहले खैरासैण गांव को जाने वाले संपर्क मार्ग को देखा तो मन प्रसन्न हुआ, जिस राज्य में महामार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, प्रांतीय राजमार्ग बदहाल हों, वहां गांव को जाने वाली सम्पर्क सड़क इतनी मक्खन जैसी दिख जाए तो, सुखद अहसास लाजिमी था। बधाई है आपको। गांव में गेंहूं की फसल कट चुकी, खेतों को देख अच्छा लगा कि जहां चारों तरफ बंजर वियावां है वहीं खैरासैण के खेत अन्न तो उगल रहे, शुभकामनाएं आपको।
किन्तु श्रीमान 13 डिस्ट्रिक्ट 13 डेस्टिनेशन के तहत पौड़ी जिले में सतपुली खैरासैण को पर्यटक स्थल बनाने की योजनाएं शायद फाइलों के पन्नों में कैद हैं। जिस झील की बात हो रही थी उसका कार्य भी सर्वे से आगे बढ़ता नहीं नज़र आ रहा। श्रीमान मन उदास हुआ कि जब जनाब के गांव की प्रस्तावित झील पर ही कार्य शुरू न हो सका तो जिले में प्रस्तावित अन्य जलाशयों के निर्माण की उम्मीद ही क्या करनी।
आगे खैरा गांव के छोटा से बाजार भी उतना ही वीरान और उदास नज़र आया, जैसे आज पहाड़ के तमाम बाजार चट्टियाँ नज़र आती हैं। भयावह सा सन्नाटा इस बात की तस्दीक कर रहा कि पहाड़ से पलायन की दर में और इजाफा हो रहा है।
सरकारी अस्पताल और स्कूल तो सिर्फ चंद लोगों को तनख्वा देने का जरिया बन चुके हैं ताकि वे देहरादून में एक घर बना सकें, कुछ प्लाट, फ्लैट खरीद सकें, बच्चे पढा सकें। वो तो शुक्र है आपके खैरसैण के आसपास जवाहर नवोदय विद्यालय और स्वामी राम इंस्टीट्यूट स्थापित है, जिन्होंने किसी हद तक अपनी प्रासंगिकता व क्षेत्र की रौनक बचा कर रखी है। वरना सरकारी सिस्टम के हाल तो आपके यहाँ भी वहीं हैं जो पूरे पहाड़ में हैं।
कुल मिलाकर अभी तक न खैरासैण और न ही गैरसैण के चेहरे पर मुस्कान आ पाई है, जिसके बिना पहाड़ी राज्य की परिकल्पना साकार होना नामुमकिन है। अभी समय बहुत है, इस तथ्य पर ध्यान देने का कष्ट कीजियेगा, अन्यथा स्वामी, भगतदा से हरदा तक कितने ही आये और..
अधिक क्या लिखूँ, अग्रिम शुभकामनाएं हैं आगामी 23 मई की, मेरा अनुमान है अपने सूबे में आप तकरीबन क्लीन स्वीप करने जा रहे हैं।
नमस्कार।
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