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सरकार पर भारी पड़ते त्रिवेंद्र के बाल सखा कैप्टेन नौटियाल

चार सौ नाली बंजर जमीन को किया सरसब्ज

सरकार पर भारी पड़ते त्रिवेंद्र के बाल सखा कैप्टेन नौटियाल

चार सौ नाली बंजर जमीन को किया सरसब्ज

खास बातें
डेयरी संचालन की तैयारी भी पूरी
स्थानीय स्तर पर मिल रहा रोजगार
कृषि विभाग का नहीं मिल रहा सहयोग
अजय अजेय रावत, पौड़ी
  अजय अजेय रावत     वरिष्ठ पत्रकार 
कैप्टेन नौटियाल के खेत
                                        कैप्टेन नौटियाल के खेत

पौड़ी। भले ही खैरासैण के लाल त्रिवेंद्र सिंह रावत को प्रदेश की बागडोर संभाले हुए एक वर्ष से अधिक हो गया हो, लेकिन अभी तक प्रदेश की तस्वीर बदलने के संकेत कम ही नजर आ रहे हैं। 17 वर्षों से बंजर पड़े इस प्रदेश को संवारने की दिशा में त्रिवेंद्र के तमाम दावे अभी जमीन पर नहीं उतर पाए हैं, लेकिन उनके गांव मलेथी-खैरासैण के उनके सखा सेवानिवृत कैप्टेन सुखदेव नौटियाल ने एक वर्ष की अनथक मेहनत के बाद बिलखेत के तिल्या में मां भुवनेश्वरी मंदिर के निकट एक दशक से बंजर पड़ी जमीन को सरसब्ज कर दिया है। करीब चार सौ नाली के इन खेतों में वर्तमान में लहरा रही गेंहू, जौ, चना व मटर की फसल उनके पुरुषार्थ की मौन गवाही दे रहे हैं। जल्द ही कैप्टेन नौटियाल यहां पर उन्नत नस्ल की गायों के साथ एक डेयरी फार्म भी खोलने वाले हैं। कैप्टेन नौटियाल ने कृषि मंत्री से एक अदद तारबाड़ की मांग की थी लेकिन विभागीय अफसर बजट की कमी का रोना रोकर पल्ला झाड़ने में लगे हैं, ऐसे में कैप्टेन ने सरकार से उम्मीद करना ही छोड़ दिया है।
एक वर्ष में बदल दी तस्वीर
बिलखेत के निकट मां भुवनेश्वरी मंदिर के निकट हजारों नाली भूमि पर पूर्व में भरपूर खेती होती थी, लेकिन एक दशक पूर्व ग्रामीणों द्वारा हिरन,भरड़ व नीलगाय जैसे जानवरों के कहर से आजिज आकर खेती किसानी से किनाराकशी कर दी गई। नतीजतन यहां के तमाम सिंचित खेत पूरी तरह लैंटाना जैसी खतरनाक झाड़ियों से ढक गए। गत वर्ष मलेथी-खैरासैण निवासी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बालसखा सेवानिवृत कैप्टन सुखदेव नौटियाल ने इन खेतों को संवारने का बीड़ा उठाया, इसके लिए उन्होने यहां के भूस्वामियों को विश्वास में लेकर कार्य शुरू किया। महज दस महीने में आज उनकी मेहनत सामने नजर आ रही है।

नए फार्मूले की फार्मिंग की शुरू
पहाड़ में सबसे बड़ी समस्या भूस्वामियों के बंजर पड़े खेतों को आबाद करने के लिए उनकी सहमति लेना होती है। ऐसे में यहां काॅरपोरेट या को-आॅपरेटिव फार्मिंग की संभावनाएं तकरीबन न के बराबर हैं। ऐसे में कैप्टेन नौटियाल ने स्थानीय काश्तकारों को विश्वास में लेकर व उन्हे इस अभियान में अपने साथ लगाकर पहले चरण में करीब चार सौ नाली जमीन को आबाद करने का बीड़ा उठाया। उनकी मेहनत रंग लाई और आज यहां सरसों, गेंहू, जौ, मटर, चना आदि की फसलों से लकदक खेत उनकी जज्बे का प्रमाण पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह इसी तर्ज पर आने वाले सीजन में दूसरे छोर की करीब चार सौ नाली अन्य भूमि को भी आबाद करने का कार्य शुरू करने वाले हैं।

डेयरी फार्म व सब्जी उत्पादन भी होगा शुरू
कैप्टन नौटियाल ने बताया कि उनका डेयरी फार्म का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, उनके द्वारा पंजाब से साहीवाल व फा्रेजन नस्ल की गायों की खरीद भी कर ली गई है, जल्द ही यह गाएं यहां पहुंच जाएगीं। उन्होने बताया कि गाय पालन के साथ ही कैश क्रोप की ओर भी रुख किया जाएगा। जिसके लिए खेतों का मिट्टी परीक्षण कर कार्ययोजना बना दी गई है। उन्होन बताया कि वह गायों के भोजन में बोरी बंद फीड के स्थान पर खेतों व फसलों से प्राप्त चारे व भूसे का इस्तेमाल करेंगे। उन्होने इस फार्म के करीब दस खेतों में बरसीम, जय आदि का रोपण किया है, जो पूरी तरह आॅरगेनिक है। उनका लक्ष्य है कि डेयरी से मिलने वाला दूध भी पूरी तरह आॅरगेनिक हो।

रासायनिक खाद का नहीं करेंगे इस्तेमाल
कैप्टेन नौटियाल का कहना है कि वह रासायनिक खाद व पेस्टीसाइड्स के विकल्प के रूप में गाय के गोबर व वर्मी कम्पोस्ट खाद का इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए उनके द्वारा वर्मी कंपोस्ट के लिए पिट बना दिए गए हैं, साथ ही फसलों की पत्तियों को कंपोस्ट खाद में बदलने के लिए भी जरूरी इंतजाम कर लिए गए हैं। पेस्टीसाइडस के लिए गौमूत्र के उपयोग की भी व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं वह परंपरागत तरीकों के मुताबिक ही खेती करने के पक्षधर हैं।

स्थानीय लोगों को ही मिलेगा रोजगार
इन बंजर खेतों को आबाद करने के लिए उनके द्वारा आस पास के गांवों के ही करीब डेढ़ सौ लोगों को कार्य पर लगाया गया, इसके बाद फसलों की बुआई, कटाई आदि में भी स्थानीय महिलाओं को ही रोजगार दिया जा रहा है। वर्तमान में उनके साथ करीब एक दर्जन स्थानीय बेरोजगार युवा स्थाई रूप से रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसे में क्षेत्र से अकुशल बेरोजगार युवाओं के पलायन पर रोक लग सकती है। यदि समूची घाटी क्षेत्र में बंजर पड़े खेतों को सरसब्ज किया जाए तो हजारों की संख्या में स्थाई व सीजनल रोजगार सृजित होना तय है।

जंगली जानवरों से बचाव है सबसे बड़ी चुनौती
घाटी में काश्तकारों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती फसलों को हिरण, नीलगाय, सूअर व बारहसिंगा जैसे जानवरों से बचाने की है। कैप्टेन नौटियाल द्वारा फिलहाल रात दिन खेतों की सुरक्षा के लिए युवा तैनात किए गए हैं, लेकिन यह काफी कठिन व मंहगा पड़ रहा है। उन्होने बताया कि तारबाड़ के लिए उनके द्वारा कृषि मंत्री सुबोध उनियाल से मिलकर गुहार भी लगाई गई थी, हालांकि मंत्री द्वारा इसे स्वीकृति प्रदान कर दी गई थी, लेकिन अधिकारी बजट का रोना रो रहे है, जिसके चलते अभी तक तारबाड़ का इंतजाम नहीं हो पाया है।

उत्साहित हैं कैप्टेन नौटियाल
कैप्टेन नौटियाल ने बताया कि स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हे उम्मीद से अधिक सहयोग किया जिसकी बदौलत वह अपने उद्येश्य में सफल हो पाए हैं। वहीं पहली फसल से मिले सकारात्मक नतीजों ने उन्हे उत्साह से लबरेज कर दिया है। उनका कहना है कि भले ही अभी उन्हे इस कार्य में करीब डेढ़ लाख रुपया प्रतिमाह व्यय करना पड़ रहा है लेकिन भविष्य के संकेत काफी बेहतर हैं। उन्हे यह भी विश्वास है कि आने वाले दिनों में घाटी क्षेत्र के अन्य काश्तकार भी उनकी सफलता से प्रेरित होकर अपने बंजर खेतों को सरसब्ज करने का बीड़ा उठाएंगे।

 

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