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जनसेवक नहीं स्वयंसेवक हैं टीएसआर!

उत्तरा तो महाभारत काल में भी छली गई, नया क्या है?

जनसेवक नहीं स्वयंसेवक हैं टीएसआर!

उत्तरा तो महाभारत काल में भी छली गई, नया क्या है?

गुणानंद जखमोला, वरिष्ठ पत्रकार।
   गुणानंद जखमोला, वरिष्ठ पत्रकार।

देहरादून। उत्तरा को महाभारत के दौरान एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। दूध के कर्ज को उतारने के लिए वीर अभिमन्यु ने चक्रव्यूह के सातों द्वार भेद दिये, लेकिन बाहर नहीं निकल सका। उस वीर ने जान गंवा दी, लेकिन कौरवों के कुचक्र की कीमत चुकाई उत्तरा ने। समय का चक्र घूमता रहा और आज एक और उत्तरा फिर सच कहने की कीमत चुका रही है।

चोर-उच्चका शब्द और शराब माफिया तो नेताओं के लिए अलंकरण हैं। यदि बेचारी उत्तरा ने जो पंत भी है और बहुगुणा भी, ये शब्द कह भी दिये तो क्या बुरा किया? उत्तराखंड के इन दो महान नेताओं बहुगुणा और पंत की धरोहर लिए हुए, उसे इस तरह से भरी सभा में सजा सुनाना, कदापि न्याय नहीं है। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, महाभारत की उत्तरा और उत्तरकाशी की शिक्षिका उत्तरा के दर्द को किसी ने नहीं समझा।

यु़द्ध किसके लिए, और क्यों, जब सब कुछ खो देना है तो फिर व्यर्थ का अहंकार क्यों? खैरासैंण के सूरज को समझना था, लेकिन वो तो सत्ता के अहंकार में दुर्योधन बन बैठे। आरएसएस के दिये संस्कार पल भर में भूल बैठे। चलो अच्छा ही हुआ। योगी सरकार से पब्लिसिटी में पीछे छूटे टीएसआर सरकार को जबरदस्त पब्लिसिटी मिली है। टेलीविजन की टीआरपी बढ़ गयी और टीएसआर की भी। कल से लगातार चर्चा में हैं अपने खैरासैंण के सूरज।

इतनी पब्लिसिटी तो उन्हें एक साल में कभी नहीं मिली। बधाई हो खैरासैंण के सूरज। ऐसे ही चमकते रहो, बेबस और असहायों पर, क्योंकि राधिका झा, नितीश झा और ओमप्रकाश जैसे अफसरों के साथ तो आपकी चलती नहीं। भ्रष्टाचार का पुलिंदा है तबादला एक्ट।

साभार- वरिष्ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक बॉल से

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