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कुली का छठी फेल बेटा यूं बना 100 करोड़ की कंपनी का मालिक

एक आइडिये ने बदली जिंदगी इस युवक की जिंदगी

कुली का छठी फेल बेटा यूं बना 100 करोड़ की कंपनी का मालिक

एक आइडिये ने बदली जिंदगी इस युवक की जिंदगी

देहरादून। इस युवक की सफलता की कहानी यही साबित करती है कि अगर मन में किसी काम को करने की ठान लो, तो कामयाबी खुद-ब-खुद आपके कदम चूमेगी। किसी कुली का बेटा महज 42 साल की उम्र में 100 करोड़ रुपए की कंपनी बना ले, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। केरल के वायनाड जिले के पीसी मुस्तफा की कहानी कुछ ऐसी ही है। सिर्फ 25 हजार रुपए से बिजनेस शुरू करने वाले मुस्तफा की सफलता देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जिनके सपने संसाधनों की कमी के कारण अक्सर टूट जाते हैं। सिर्फ 25 हजार रुपए से बिजनेस शुरू करने वाले मुस्तफा की सफलता देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जिनके सपने संसाधनों की कमी के कारण अक्सर टूट जाते हैं।

6वीं क्लास में हो गया था फेल
कमजोर पृष्ठभूमि और संसाधनों की कमी के कारण मुस्तफा का बचपन बेहद अभाव में बीता। वे छठी क्लास में फेल हो गए थे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और पहले कालीकट के रीजनल इंजीरियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली और फिर बेंगलुरु आईआईएम से एमबीए किया। छठी क्लास में फेल होने के बाद उनके पिता ने उनसे कुली बनने के लिए कहा। हालांकि चूंकि उनका गणित अच्छा था, इसलिए उनके शिक्षक ने उनसे पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा। फेल करने के कारण उनके सभी मित्र अगली क्लास में चले गए। बाद में शिक्षक की प्रेरणा से वे क्लास 7 में टॉप आए. इसके बाद क्लास 10 में भी वे टॉप आए। कमजोर पृष्ठभूमि और संसाधनों की कमी के कारण मुस्तफा का बचपन बेहद अभाव में बीता। वे छठी क्लास में फेल हो गए थे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और पहले कालीकट के रीजनल इंजीरियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली और फिर बेंगलुरु आईआईएम से एमबीए किया।

लम्बा सफर लेकिन हिम्मत नहीं हारी
मुस्तफा कहते हैं, मैं वायनाड में कलपट्टा के पास चेन्नालोड नामक एक छोटे से गांव में पला बढ़ा, जहां न ही पक्की सड़क थी और न ही बिजली। रोजाना उच्च विद्यालय जाने के लिए हमको कम से कम चार किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती थी। रोज इतना लम्बा सफर तय करने की वजह से कई बच्चे शिक्षा ग्रहण भी नहीं कर पाए। मेरे पिता ने भी कक्षा 4 के बाद पढ़ाई बंद कर दी थी और एक कॉफी बागान पर कुली के रूप में काम करते थे। मेरी तीन छोटी बहनें हैं।

एक आइडिये ने बदली जिंदगी
कुछ सालों तक नौकरी करने के बाद मुस्तफा ने आंत्रप्रेन्योर बनने की ठानी, ताकि गांवों से आने वाले कमजोर ब्रैकग्राउंड के लोगों को वे रोजगार उपलब्ध करा सकें। उन्होंने इसके लिए बिजनेस भी वैसा ही चुना। आज मुस्तफा की कंपनी आईडी फ्रेश के इडली और डोसा बेंगलुरु, चेन्नई, पुणे, मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, मेंगलुरु और यहां तक कि दुबई के घरों में भी पहुंच रहे हैं।
एक बार मुस्तफा ने देखा कि एक लड़का डोसा के बैटर को पॉलीथीन में रबरबैंड से बांधकर बेच रहा है और यहीं से मुस्तफा को विचार आया कि इस व्यवसाय को एक बड़े पैमाने पर शुरू किया जा सकता है। मुस्तफा ने इस काम की शुरुआत करने का मन बनाया। मुस्तफा के पांच चचेरे भाइयों ने उसके इस काम में हाथ बंटाया। जहां पांच लोगों द्वारा इस कंपनी में दिन के केवल 10 पैकेट्स बनते थे, वहीं आज 2016 में इस कंपनी में 1100 कर्मचारी काम कर रहे हैं, जो प्रतिदिन 50,000 पैकेट बनाते हैं। आज वह कई ग्रामीण लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

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