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काश! उत्तराखंड का हर जनप्रतिनिधि अनिल बलूनी की तरह सोच रखता

नासूर बन चुकी स्वास्थ्य सेवाओं पर मरहम लगाने में जुटे बलूनी

काश !उत्तराखंड का हर जनप्रतिनिधि अनिल बलूनी की तरह सोच रखता

नासूर बन चुकी स्वास्थ्य सेवाओं पर मरहम लगाने में जुटे बलूनी

देहरादून। उत्तराखंड को बने 18 साल हो गए हैं लेकिन यहां मूलभूत सुविधाओं की स्थिति जो उत्तर प्रदेश के समय थी वही आज भी है। उसमें थोड़ा बहुत सुधार हुआ है लेकिन वह पर्वतीय क्षेत्र की जनता के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। सड़क, बिजली, पानी और स्वास्थ्य की सुविधाएं आज भी पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में ना के बराबर है। खासतौर से स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर्वतीय इलाकों में काफी खराब है स्वास्थ्य केंद्र महज रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं।

पौड़ी सड़क हादसे दुखी भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है ।सांसद अनिल बलूनी यह निर्णय लिया है कि पर्वतीय जिलों में अपनी सांसद निधि से हर साल दो से तीन आईसीयू केंद्रों का निर्माण कराएंगे। इस वर्ष की राशि स्वास्थ्य विभाग के साथ आंकलन के बाद जारी कर दी जाएगी । दुर्गम क्षेत्रों में ICU केंद्र ना होने से गंभीर रोगियों को हायर सेंटर जाना पड़ता है । दुर्गम क्षेत्रों में आईसीयू बन जाने से उनको तत्काल चिकित्सा मिलने से काफी लाभ होगा और दुर्गम वह पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत मिल सकेगी। अनिल बलूनी ने कहा कि कल की दुखद घटना ने उन्हें इस समस्या के प्रति गंभीर रूप से सोचने को विवश किया है। उन्होंने इस को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और स्वास्थ्य महानिदेशक से वार्ता कर उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में आईसीयू केंद्रों की स्थापना के संबंध में गहन चर्चा की है। जल्द इस पर काम की सुरुआत हो जाएगी।

उत्तराखंड में नहीं सुधरा स्वास्थ्य सेवाओं का हाल

उत्तराखंड राज्य बने 18 साल हो चुके है, लेकिन इतने वर्षों के बाद भी इसकी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ है। 10 पर्वतीय और तीन मैदानी जनपदों वाले इस प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल आज भी बेहाल है। एक तो पहाड़ की दुभर परिस्थितियां और उसपर अस्पताल में न डॉक्टर, न दवा। नतीजतन सर्दी-जुकाम की दवा के लिए भी पहाड़ी लोगों को शहरी इलाकों की दौड़ लगानी पड़ती है। पर्वतीय इलाकों में सेहत भगवान भरोसे है। लाख कोशिशों के बाद भी महकमा डॉक्टरों को पहाड़ चढ़ाने में नाकाम रहा है।

उत्तराखंड में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन शराब और खनन तक ही सीमित रहीं। मूलभूत जरूरतों पर किसी भी हुकुमरान की नजर नहीं पहुंच पाई। 18 साल का ये युवा प्रदेश के हुक्मरान पहाड़वासियों के मर्ज का इलाज नहीं खोज पाए। पहाड़ में न सिर्फ चिकित्सक बल्कि अन्य स्टाफ व दवाओं की भी कमी बनी हुई है। साफ शब्दों में कहें तो सरकारी अस्पताल महज उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित हैं। सूबे में चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए सरकारी स्तर पर भावी डॉक्टरों को बांड की शर्तों में बांधने से लेकर तमाम प्रयास किए गए, मगर सफलता नहीं मिली। यहां तक की स्वास्थ्य सुविधाओं के आधारभूत ढांचे में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इसकी वजह भी साफ है की सरकार दूरस्त क्षेत्रों में डॉक्टरों को इसलिए भी नहीं पहुंचा पा रही है कि जिन डॉक्टरों की पोस्टिंग पर्वतीय इलाकों में होनी है उनके सामने पारिवारिक संकट खड़ा हो जाता है।

वरिष्ठ फिजीशियन डॉ एसडी जोशी का बड़ा बयान

वरिष्ठ फिजीशियन डॉ एसडी जोशी की मानें तो डॉक्टर तब ही पहाड़ चढ़ेगा जब उनको और उनके परिवार के लिए सरकार कोई नीति निर्धारण करेगी और हर तीसरे साल ट्रांसफर की व्यवस्था करे और हर अस्पताल में तमाम साजो सामान की भी जरूरत पूरी करे ताकि सर्जन भी हर अस्पताल में सर्जरी कर सके।

उत्तराखंड के जन मानस भी अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। 18 सालों में सरकारें स्वास्थ्य जैसे अहम विभाग को दुरुस्त नहीं कर पाईं। सरकारी चिकित्सा सेवाओं की बदहाल स्थिति के कारण निजी अस्पतालों और डॉक्टरों की शरण में जाना लोगों की मजबूरी बन गई है।

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One Comment

  1. श्री अनिल बलूनी जी ने बहुत ही हितकर कार्य किया है, काश सभी मांत्रियों एवं सांसदो की भी ऐसी ही सोच हो जाये।

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