उत्तराखंडखबर इंडिया

हे सरकार…! पहले पहाड़ का बदलो जोग , फिर चाहे करो कितना भी योग

जिनका 'कपाल' ही फूटा हो, उनके लिए कैसा "कपाल भाती" ..?

हे सरकार…! पहले पहाड़ का बदलो जोग , फिर चाहे करो कितना भी योग

जिनका ‘कपाल’ ही फूटा हो, उनके लिए कैसा “कपाल भाती” ..?

अजय रावत, वरिष्ठ पत्रकार
अजय रावत, वरिष्ठ पत्रकार

★जिस पहाड़ में मिड डे  ढ़ाबों(सरकारी स्कूलों) से निकले युवा रोजगार व आजीविका की फ़िक्र में सिंगल पसली हुए जा रहे हैं, उस सूबे में किसकी चर्बी गलाने को हो रहा ये योग..

★जिस पहाड़ की महिलाओं के “जोग” (भाग्य) में सिर्फ और सिर्फ दुश्वारियां हों, उस प्रदेश में योग किसके लिए..? जिस पहाड़ की महिलाएं घास, लकड़ी पानी ढो ढो कर एनीमिया की शिकार हों, जिन मां बहनों के चेहरे खून की कमी से मुरझा गए हों, वहां किसके गालों की चर्बी जलाने को योग…?

★जिस पहाड़ के सूखे सख्त खेतों को चीरने में “हल्या” और “बल्दों” का खून पसीना एक हो गया हो वहां यह योग किसके लिए..?
★जिस पहाड़ में गूणी बांदर सुंगर भगाते भगाते काश्तकारों का दम फूल गया हो वहां यह योग किसके लिए..?

★जिस प्रदेश के 9 पहाड़ी जिलों के लोगों का “कपाल” ही फूटा हो, वहां यह कपालभाति योग किसके लिए..जिस पहाड़ में सब कुछ ‘विलोम ही विलोम’ हो रहा हो वहां यह “अनुलोम-विलोम” योग किसके लिए..?

★और आखिरी बात योग शांति व सौम्यता का विषय है उसके लिए यह तड़क भड़क व जलसा क्यूं..? और दरअसल यह योग खाते पीते चर्बी चढ़े लोगों की जरूरत है, उन मारवाड़ी टाइप भीमकाय सेठों की जरूरत है जिनको गैस पास के लिए पिछवाड़ा उठाने के लिए भी एक नौकर की दरकार होती है..

पहले इस सूबे के सभी वाशिंदों पर चर्बी चढ़ाइए,, फिर करेंगे योग.. जमकर करेंगे योग..

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