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सरकार, युवा अफसरों को सियासत नहीं सम्मान दो..!

अपने उत्तराखंड में भी हैं कई 'यूनुस' 

सरकार, युवा अफसरों को सियासत नहीं सम्मान दो..!

अपने उत्तराखंड में भी हैं कई ‘यूनुस’ 

योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार
 योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार

देहरादून । हिमाचल से कुछ तो सीख लेनी ही चाहिए । यहां हम रोना रो रहे हैं नौकरशाही बेकाबू है, सिस्टम पर हावी है, वहीं हिमाचल में नौकरशाह बेहतरीन प्रशासन की मिसाल कायम कर रहे हैं। वहां काम करने वाले अफसरों का नाम प्रदेश में ही नहीं देश दुनिया में बड़े सम्मान के साथ लिया जा रहा है। उनका मनोबल बढ़ाया जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि अपने यहां संवेदनशील अफसर नहीं हैं या उनमें कुछ नया कर गुजरने का जज्बा नहीं है । प्रदेश में ऐसे अफसर अच्छी संख्या में हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड में ऐसे अफसरों का मनोबल बढ़ाया नहीं जाता बल्कि गिराया जाता है। हिमाचल सियासत से ऊपर उठकर ऐसे अफसरों का हौसला बढ़ाता है, उन्हें सम्मान देता है । अपने यहां स्थितियां उलट हैं, नौकरशाहों की अंदरूनी राजनीति ऐसे युवा अफसरों को निखरने नहीं देती । सीनियरटी जूनियरटी का भेद, डायरेक्ट और प्रमोटी का भेद, इसके बाद लोकल और बाहरी का भेद । कोई कुछ करना भी चाहे तो परिस्थतियां इस कदर विपरीत कर दी जाती हैं कि युवाओं को कदम पीछे खींचने होते हैं। राजनैतिक ताकतें भी ऐसे युवा अफसरों को हतोत्साहित करती है, यहां राजनेता अफसर की लोकप्रियता को मान्यता देना तो दूर उसे पचा तक नहीं पाते ।

यूनुस को बेहतरीन प्रशासक के रूप में पुरस्कृत किया गया
दूसरी ओर हिमाचल में तैनात आईएएस अफसर यूनुस को ही लें । 2010 बैच का यह युवा अफसर हिमाचल में अपनी विशिष्ठ कार्यशैली के चलते बेहद लोकप्रिय है । यूनुस अलग कार्यशैली के चलते आम अफसरों से अलग पहचान बनाए हुए हैं। लोगों तक सीधी पहुंच रखने वाले यूनुस हमेशा गांव और गरीब को प्राथमिकता देते हैं। हाल ही में उन्हें एक राज्य स्तरीय समारोह में प्रदेश का सर्वोच्च सिविल सर्विस एवार्ड प्रदान किया गया। यूनुस को बेहतरीन प्रशासक के रूप में पुरस्कृत किया गया। यूनुस ने जिलाधीश रहते हुए कुल्लू जिले के तमाम देवी-देवताओं व धार्मिक स्थलों की जानकारी जुटाकर वेबसाइट पर उपलब्ध करायी। इसमें कुल्लू की समृद्ध एतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया ताकि कुल्लू को विश्व विख्यात किया जा सके । उन्होंने इसी क्रम में कुल्लू के स्थानीय व्यंजनों को भी विश्व भर में पहचान दिलायी । पहली बार उन्होंने जियो ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया । यानी देश-दुनिया से आने वाले पर्यटक इससे जुड़कर कहीं भी घूम सकते हैं । उनकी लोकेशन व डाटा वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा ताकि विपरीत परिस्थति में उन्हें मदद उपलब्ध करायी जा सके ।
यूनुस की लोकप्रियता यूं ही नहीं है, इस अफसर ने सियाचिन में तैनात सैनिकों के साथ रहने का नया रिकार्ड भी स्थापित किया हुआ है । तकरीबन 1600 किमी का सफर सड़क मार्ग से तय कर कठिन भौगोलिक परिस्थितयों का सामना करते हुए वह सियाचिन पहुंचे । 

उत्तराखंड में साफ छवि के अफसरों की संख्या काफी बड़ी है ।
पंजाब के तरनतारन में शहीद हुए एक नायब सूबेदार परमजीत सिंह की बेटी खुशदीप को उन्होंने गोद लिया हुआ है । परमजीत सीमा पर पाकिस्तान की बर्बरता का शिकार हुए थे। यूनुस ने बेटी की शिक्षा के साथ पालन पोषण का दायित्व भी उठाया। नियमित तौर पर हर त्यौहार पर वह तरनतारन पहुंचते हैं । भावनात्मक व्यक्तित्व के यूनुस ने पहली बार डीसी का दायित्व संभालने पर ‘जिलाधीश से कहिए’ कार्यक्रम की शुरूआत की । बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के लिये कई कार्यक्रम आयोजित किये । दुर्गम क्षेत्रों में सरकारी स्कूल में बच्चों को नंगे पैर देखा तो जूते मुहैया कराये । उन्हें एक ऐसे अफसर के तौर पर जाना जाता है जो किसी भी गरीब की झोपड़ी में पहुंच जाया करते हैं । सरकारी योजनाओं का लाभ देने के लिये खुद फार्म भरने से लेकर उनकी मानीटरिंग तक करते हैं। यूनुस 2010 बैच के अधिकारी हैं।
अपने उत्तराखंड में भी ‘यूनुस’ हैं, आईएएस अफसरों में मंगेश घिल्डियाल, आशीष जोशी, षड़मुगम, धीराज गर्ब्याल, अहमद इकबाल, सोनिका, रंजना, स्वाति, नितिन भदोरिया, आईपीएस अफसरों में सदानंद दाते, वीके कृष्ण कुमार, निवेदिता, जन्मजेय खंडूड़ी, तृप्ति भट्ट ऐसे नाम हैं जो प्रदेश में खासे लोकप्रिय हैं । यह नाम तो बानगी भर हैं, उत्तराखंड नौकरशाही को लेकर भले ही बदनाम हो लेकिन आज साफ छवि के अफसरों की संख्या काफी बड़ी है ।

दुर्भाग्य यह है कि इनका मनोबल न नौकरशाह बढ़ाते हैं और न ही सरकार
पिछले कुछ सालों में जो युवा अधिकारी उत्तराखंड आए हैं, उन्होंने उम्मीद की लौ को फिर से जिंदा किया है । प्रदेश के अलग अलग जिलों में महकमों में तमाम युवा अधिकारी खुद का साबित करने में जुटे हैं । लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इनका मनोबल न नौकरशाह बढ़ाते हैं और न ही सरकार । सरकार कहती जरूर है कि ईमानदारी से काम करने वालों को प्रोत्साहित करेंगे लेकिन अक्सर तमाम मौकों पर होता इसके उलट है । ईमानदारी से जांच करने वालों की जांच पर यहां जांच बैठायी जाती है । अहम जिम्मेदारियों और पदों से अक्सर उन्हें दूर रखा जाता है, इसके भी कई उदाहरण प्रदेश में मौजूद हैं ।

बिना राजनैतिक इच्छाशक्ति के संभव ही नहीं

संस्थागत गिरावट राजनीति और नौकरशाही दोनो में ही बहुत तेजी से आ रही है । नतीजा सामने है, तमाम मौकों पर डीएम का काम सीएम करते नजर आते हैं तो डीएम की भूमिका डिस्पैच बाबू सरीखी हो चली है । यह मान लेना होगा कि व्यवस्थागत सुधार उत्तराखंड की बड़ी जरूरत बना हुआ है, और यह बिना राजनैतिक इच्छाशक्ति के संभव ही नहीं । राज्य हित में सियासत और निजी हितों से ऊपर उठकर काबिल और प्रतिभावन अफसरों को मौका देना ही होगा, उनका मनोबल बढ़ाना होगा। वरना उन तमाम युवा अफसरों को भी रंग बदलते देर नहीं लगेगी, जिनमें जिम्मेदारी का जुनून अभी बाकी है।

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