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खुशखबरी:- गरीब बच्चों के लिये संजीवनी बना राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम

थैलेसीमिया सहित कई गंभीर बीमारियों का हो रहा मुफ्त इलाज

खुशखबरी:- गरीब बच्चों के लिये संजीवनी बना राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम

थैलेसीमिया सहित कई गंभीर बीमारियों का हो रहा मुफ्त इलाज

अर्चना शर्मा, पत्रकार व समाजसेवी। 
अर्चना शर्मा, पत्रकार व समाजसेवी। 
देहरादून। उत्तराखंड के गरीब बच्चों के लिये संजीवनी साबित हा रहा है केन्द्र सरकार का राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम। केन्द्र सरकार की यह योजना गरीब मां-बा के चेहरों पर खुशियां लाने का काम कर रही है। यही नहीं थैलेसीमिया से पीड़ित गरीब बच्चों के लिये भी यह कार्यक्रम ईश्वर के वरदान से कम नहीं है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के कोरोनेशन यानि पंडित दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की प्रभारी डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक इस योजना के तहत करीब 30 बीमारियों का इलाज मुफ्त कराया जाता है। इसके लिए जिला स्तर के सरकारी अस्पतालों में केंद्र भी खोले गए हैं। गरीब बच्चों को सुपर स्पेश्यिल्टी स्तर की सेहत सुविधाएं मुफ्त मुहैया कराने के लिए यह कार्यक्रम शुरू किया गया है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की प्रभारी डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक इसके तहत बच्चों की दिल की विभिन्न बीमारियों (दिल में छेद समेत), कटे हुए होंठ, आढ़े-टेढ़े दांत, आंखों में जन्मजात सफेद मोतिया, टेढ़े पैर (क्लब फुट), विटामिन डी की कमी, सुनने की दिक्कत, श्वास नली की बीमारियां इत्यादि समेत करीब 30 बीमारियों का इलाज महंगे अस्पतालों में फ्री कराया जाता है।
डाॅ अनु स्वरूप की जुबानी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की जानकारी
डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम केन्द्र सरकार की एक नई पहल है। जिसका उद्देश्य 0 से 18 वर्ष के 27 करोड़ से भी अधिक बच्चों में चार प्रकार की परेशानियों की जांच करना है। इन परेशानियों में जन्म के समय किसी प्रकार के विकार, बीमारी, कमी और विकलांगता सहित विकास में रूकावट की जांच शामिल है।
बाल मृत्यु दर में आई है कमी
डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत बाल स्वास्थ्य जांच और जल्द उपचार सेवाओं का उद्देश्य बच्चों में चार तरह की परेशानियों की जल्द पहचान और प्रबंधन है। इन परेशानियों में जन्म के समय किसी प्रकार का विकार, बच्चों में बीमारियां, कमियों की विभिन्न परिस्थितियां और विकलांगता सहित विकास में देरी शामिल है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत शुरू किये गये इस कार्यक्रम ने महत्वपूर्ण प्रगती की है और बाल मृत्यु दर में कमी आई है।
बच्चों में कुछ प्रकार के रोग समूह बेहद आम
डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक वार्षिक तौर पर देश में जन्म लेने वाले 100 बच्चों में से 6-7 जन्म संबंधी विकार से ग्रस्त होते हैं। बच्चों में कुछ प्रकार के रोग समूह बेहद आम है जैसे दाँत, हृदय संबंधी अथवा श्वसन संबंधी रोग। यदि इनकी शुरूआती पहचान कर ली जायें तो उपचार संभव है। इन परेशानियों की शुरूआती जांच और उपचार से रोग को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है। जिससे अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत नहीं आती और बच्चों के विद्यालय जाने में सुधार होता है।
कुपोषण का शिकार भी होते हैं बच्चे
डाॅ अनु स्वरूप के मुताबिक एक रिपोर्ट के मुताबिक द्वारा यह बात सामने आई है कि पांच वर्ष तक की आयु के लगभग आधे (48 प्रतिशत) बच्चे अनुवांशिक तौर पर कुपोषण का शिकार है। संख्या के लिहाज से पांच वर्ष तक के लगभग 47 मिलियन बच्चे कमजोर हैं। 43 प्रतिशत का वजन अपनी आयु से कम है। पांच वर्ष की आयु के कम के 6 प्रतिशत से भी ज्यादा बच्चे कुपोषण से भारी मात्रा में प्रभावित है। लौह तत्व की कमी के कारण 5 वर्ष की आयु तक के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे अनीमिया के शिकार है।
थैलेसीमिया पीड़ित गरीब बच्चों का होगा मुफ्त इलाज
थैलेसीमिया से पीड़ित गरीब बच्चों के मां-बाप के लिए एक खुशखबरी है। अब केंद्र सरकार के राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत इन बच्चों का इलाज भी फ्री हो रहा है। यह सुविधा आंगनवाड़ी केंद्र या सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों को मिलेगी। सेहत विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2017-18 में आंगनबाड़ी केंद्रों और सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे जीरो से 18 साल तक की उम्र के तीन लाख बच्चों का चेकअप किया गया। इनमें से अलग-अलग बीमारियों से पीड़ित 2755 बच्चों का आरबीएसके के तहत इलाज कराया गया। अब थैलेसीमिया पीडित बच्चों का बोन मेरो ट्रांसप्लांट के जरिए इलाज भी इस योजना में शामिल किया गया है। इस इलाज पर 13-14 लाख रुपए का खर्च आता है। मगर गरीब परिवार के बच्चों को यह सुविधा मुफ्त मिलेगी। आपको बता दें कि थैलेसीमिया के एक मरीज के इलाज पर सालाना दो से ढाई लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। सही इलाज के अभाव में करीब आधे मरीज 20-25 वर्ष की उम्र तक दम तोड़ देते हैं। भारत में हर साल 10 से 15 हजार थैलेसीमिक बच्चे जन्म लेते हैं। सिकल सेल के एक मरीज के इलाज पर सालाना एक लाख 75 हजार रुपए तक खर्च होते हैं। इस बीमारी वाले करीब 40 हजार मरीज हर वर्ष जन्म लेते हैं। अभी इस बीमारी से पीड़ित करीब चार लाख मरीज हैं।
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