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एक्सक्लूसिव:- ऊर्जा विभाग में करोड़ो के कबाड़ पर घमासान 

आखिर इस कंपनी पर ही क्यों मेहरबान हैं अधिकारी? 

खुलासा :- ऊर्जा विभाग में करोड़ो के कबाड़ पर घमासान

आखिर इस कंपनी पर ही क्यों मेहरबान हैं अधिकारी? 

सुलगता सवाल :-  कबाड़ ख़रीदने में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है UPCL प्रबंधन 

देहरादून।  ऊर्जा विभाग जो गुल ना खिलादे वो ही कम नज़र आता है, अपने हर फ़ैसले को लेकर विवादों में रहने वाला ऊर्जा विभाग अब कबाड़ ख़रीदने को लेकर नए विवाद में फँसता हुआ नज़र आ रहा है। उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन के अधिकारी 5 साल पुराना सामान खरीदने के लिए हर वो जुगत लगाने का काम कर रहे है, जिससे करोड़ों रुपय में पुराने सामान को ख़रीदा जा सके। केंद्र सरकार ने 16 शहरों में बिजली व्यवस्था को हाईटेक करने के लिए UPCL को 5 साल पहले IPDS स्कीम के तहत मेसर्स जीनस कम्पनी को 235 करोड़ में ये काम सौंपा। लेकिन काम स्वीकृत होने के बाद कम्पनी ने आधे में ही काम छोड़कर हाथ खड़े करने का काम किया। जिसके बाद जैसे तैसे निगम ने अपने ठेकेदारों के माध्यम से इस काम का पूरा कराया।
काम तो हो गया लेकिन अब कम्पनी का कई शहरों में करीब 18 से 20 करोड़ का सामान साइडो में पड़ा धूल फाँक रहा है। जिसको ख़रीदने का प्रस्ताव निगम ने दिया है।हालांकि इसके लिए गठित कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी है उसमें ये सारा सामान पूरी तरह से बेकार है और किसी काम का भी नहीं है। पुराने हो चुके सामान में पार्ट भी पुराने है। रेट इतने ज़्यादा है की आज वो बाज़ार में कहीं भी नहीं टिकते। कुल मिलाकर जीनस कम्पनी का सारा सामान कबाड़ ही है।
UPCL की कमेटी इस मामले में 26 नवम्बर 2018 को अपनी रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप चुकी है। लेकिन प्रबंधन को इस कबाड़ में भी सोना नज़र आता है जिसके चलते 15 मई 2019 को प्रबंधन ने कमेटी को दोबारा से पत्र लिखकर अवगत कराने की बात कही है। ऐसा नहीं है की मेसर्स जीनस कम्पनी के पुराने सामान की जानकारी उच्च अधिकारियों को नहीं। जहाँ MD UPCL बी सी के मिश्रा लगातार कमेटी को पत्र लिख query लगा रहे है। वहीं तेज़ तरार कही जाने वाली सचिव ऊर्जा राधिका झा मामला सामने आने पर जानकारी जुटाने की बात कर रही है
ऊर्जा निगम में एक निजी कंपनी से सांठगांठ कर कंपनी को फायदा पहुंचाने की पूरी तैयारी चल रही है। निगम कंपनी का ऐसा सामान खरीदने को बेताब है, जो चार-पांच साल पुराना है। सामान खरीदने के लिए जो कमेटी बनाई गई थी, वह भी इस पर आपत्ति जता चुकी है।  सूत्रों की माने तो कमेटी ने प्रबंधन की बात मानकर या दबाव में आकर अपनी टिप्पणियों में बदलाव करने का मन बना लिया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है की जो कम्पनी पाँच साल में काम पूरा ना कर अधूरा छोड़ चुकी हो, उससे कबाड़ ख़रीदने में UPCL प्रबंधन इतनी दिलचस्पी क्यूँ दिखा रहा है। जबकि वही सामान खुले बाज़ार में कम दाम और नई तकनीक के साथ आसानी से उपलब्द भी है।
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