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आपकी यह आदत देती है आपके मासूम बच्चे को मानसिक तनाव ?

आप खुद बना सकते हैं अपने बच्चे को होशियार, संस्कारी और चरित्रवान?

आपकी यह आदत देती है आपके मासूम बच्चे को मानसिक तनाव ?

आप खुद बना सकते हैं अपने बच्चे को होशियार, संस्कारी और चरित्रवान?

कैसे? बता रहीं हैं प्रसिद्व मनोचिकित्सक डाॅ प्रतिभा शर्मा
अर्चना शर्मा
      अर्चना शर्मा

देहरादून। मनोविज्ञान में हमारे लिए असामान्य और अनुचित व्यवहारों को मनोविकार कहा जाता है। ये धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। मनोविकारों के बहुत से कारक हैं, जिनमें आनुवांशिकता, कमजोर व्यक्तित्व, सहनशीलता का अभाव, बाल्यावस्था के अनुभव, तनावपूर्ण परिस्थितियां और इनका सामना करने की असामर्थ्य सम्मिलित हैं। यह गलत धारणा है कि बच्चों में मानसिक समस्याएं या विकार नहीं होते हैं। वास्तव में, बच्चों में भी वही मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ विकसित हो सकती हैं जो बड़ों में देखी जाती हैं। हालांकि, लक्षण भिन्न हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, डिप्रेस्ड वयस्क आमतौर पर उदासी और निराशा दिखाते हैं, लेकिन एक उदास बच्चा अधिक चिड़चिड़ापन और क्रोध दिखा सकता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने बताया है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से 4 से 16 वर्ष की उम्र के बीच के 12 प्रतिशत बच्चों को सामना करना पड़ता है। कुछ अन्य अध्ययनों से पता चला है कि लगभग 20 प्रतिशत भारतीय बच्चे मनोवैज्ञानिक विकारों से पीड़ित होते है । जिनमें से 2-5 प्रतिशत औटिस्म, सिजोफ्रेनिया, आदि जैसे गंभीर विकार हैं।
आज हम मानसिक रोग से जुड़े तमाम सवालों के जवाब हासिल करेंगे उत्तराखंड की प्रसि़द्व मनोचिकित्सक डाॅ प्रतिभा शर्मा से। डाॅ प्रतिभा शर्मा जिन्होने क्लीनिकल साइकोलाॅजी में महारत हासिल की हुई है। आज वह देहरादून के दून हास्पिॅटल में एक मनोचिकित्सक के तौर पर लोगोें की समस्याओं को दूर करने का काम कर रहीं हैं। आईए उन्हीं से जानते हैं कि आखिर आज के बच्चे किस तरह के मनोवैज्ञानिक रोग से परेशान है और कैसे इससे छुटकारा पाया जा सकता है?

सवाल- मानसिक विकार या जिसे हम मनोवैज्ञानिक रोग कहतें हैं, बच्चों में यह किस तरह होता है ?
जवाब- देखिए कुछ साल पहले हमारे देश में मानसिक रोगों के बहुत कम रोगी हुआ करते थे, वहीं आज इनकी संख्या बढ़ रही है। मानसिक रोगों के बारे में विशेष बात यह है कि यह तय कर पाना मुश्किल है कि कोई व्यक्ति सच में मानसिक रोग से पीड़ित है या फिर केवल उसकी आदतों के कारण उसका बर्ताव कष्टदायी बन रहा है। स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के लिए बच्चों में मानसिक विकारों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है। बच्चे ब्यस्कों से अलग होते है, क्योंकि वे अपने प्राकृतिक विकास, और विकास के माध्यम से प्रगति के साथ कई शाररिक, मानसिक और परिवर्तन का अनुभव करते है। मानसिक रोग बच्चे में जन्म से भी हो सकता है या फिर अधिकतर जो मरीज मुझे देखने को मिलते हैं वो 18 से 20 साल की उम्र के ज्यादा देखने को मिलते हैं।

सवाल- टीन ऐज यानि अव्यस्क बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्या ज्यादा देखने को मिल रही है, इसके पीछे क्या कारण है ?
जवाब- इसका सबसे बडा कारण यही है कि एक तो अधिकतर माता-पिता अपनी जाॅब में बिजी रहतें हैं। इसके अलावा आज अधिकतर परिवार संयुक्त परिवार में रहना पसंद नही करते हैं। जब माता-पिता अपनी जाॅब पर रहते हैं तो ऐसे समय में बच्चा घर में अकेला रहता है। ऐसे समय में बच्चा फ्रस्टेड होता है और उसे अकेलापन महसूस होता है, तो उस समय वह गलत कामों में लग जाता है। इन सब के पीछे यही करण है कि जब बच्चे को आउटडोर एक्टिविटी नहीं मिलती है तो वह मोबाईल पर या टीवी पर वो चीजें देखने का आदी हो जाता है। जिससे उसके शरीर के साथ-साथ उसे मनोवैज्ञानिक रूप से भी परेशान करने लगता है।

सवाल- कई बच्चोें में यादाश्त की समस्या को भी देखने को मिलती है। यानि वह थोड़ी देर में ही भूल जाते हैं कि उन्हें का क्या गया था। इसके पीछे क्या वजह है ?
जवाब- इसके पीछे सबसे बडी वजह यही है कि बच्चों को सही समय पर उचित खान-पान नहीं मिल पाता है। इसके अलावा उनके शरीर को जो प्रोटीन, विटामिन, क्रार्बोहाइड्रेट जैसे पोषक तत्व मिलने चाहिए वो नहीं मिल पाते हैं। जिससे बच्चों की मैमोरी तो कमजोर होती ही है साथ ही उनके शरीर का विकास भी सहीं ढंग से नही हो पाता है।

सवाल- आज के बच्चों का एकेडमिक परर्फोरमेंस भी काफी कमजोर हो रही है। इसके पीछे क्या वजह लगती है?
जवाब- देखिए इसके पीछे कई सारे कारण हैं। जो सबसे बडा कारण है वो यही है कि जब पेरेटंस जाॅब पर चले जातेे हैं तो उस दौरान बच्चे की देखभाल के लिए कोई नहीं होता है। ऐसे समय में बच्चे या तो टीवी देखेंगे, या फिर गलत संगत में पढ़कर वह ऐसी साईटस देखते हैं जो उनके लिए सही नहीं है। यहीं नहीं पोर्न फिल्मस भी देख सकते हैं। बच्चे हर वो चीज करने की कोशिश करतें हैं जो उनके शरीर के लिए हानिकारक होता है। क्योंकि जब बच्चे घर से बाहर आउटडोर एक्टिविटी नहीं करेंगें वो खेलेंगें नहीं ऐसे में वो गलत कामों में ही अपना समय गुजारेगें। इसलिए मेरा मानना है कि जितना हो सके बच्चों के साथ घर में किसी बडे का का होना बहुत जरूरी है।

सवाल- क्या गूगल की साइटस और टीवी सीरियल का बच्चों के दिमाग पर गलत प्रभाव पडता है?………………………..-जवाब- देखिए आज टेक्नोलाॅजी का जमाना है। आज हर चीज इटरनेंट पर मौजूद है लेकिन जब छोटे बच्चों के हाथ में मोबाईल या कप्ंयॅूटर लगता है और जिस समय बच्चे घर में अकेले रहते हैं तो वह मनचाहा काम करने के लिए आजाद है। गलत साईट्स देखने का या फिर टीवी पर ऐसे सीरियल देखेगा, जिससे उसके मस्तिष्क पर बुरा असर पडेगा। क्योंकि आप खुद देखिए कि आज के बच्चों में सहनशक्ति बिल्कुल भी नहीं रही। कारण यही है कि वो ऐसी चीजें या सीरियल देखतें हैं जो बच्चों को करने के लिए भी उकसाती है। इसलिए देखिए कि आज बहुत से बच्चे ड्रग्स लेने लगे हैं, स्मोकिगं करने लगे हैं। खास बात यह है कि छोटी सी उम्र में उनका सेक्स की तरफ झुकाव होने लगा है और इसलिए आज हर कोई गर्लफेड बनाने की सोचता है और जब बच्चों की ये सब चीजें पूरी नहीं होती हैं तो वो स्वाभाविक रूप से गलत कामों की तरफ बढ जाते हैं ।

सवाल- अगर पेरेटंस के पास बच्चों के लिए समय नहीं है तो, ऐसे में बच्चों पर कैसे नजर रखी जाए ? कैसे उन्हें इन सब चीजों से दूर रखा जाए ?
जवाब- देखिए मेरा यही कहना है कि अगर पेरेंटंस के पास समय नही है तो जब तक आपका बच्चा कम से कम 19 साल का ना हो जाए तो उसे ऐसी चीजों से दूर रखिए जो उसके लिए हानिकारक हों। जैसे बच्चों को मोबाईल फोन ना दें अगर वो अपनी पढाई से संम्बधित कुछ नोट निकालना चाहता है तो बच्चों को अपने पास बिठाकर उसकी हेल्प करें लेकिन जितना हो सके उन्हें ऐसी सभी चीजों से दूर रखिए जो उनके लिए हानिकारक हों।

सवाल- माता-पिता को आप क्या सुझाव देना चाहेंगी कि वह किस तरह अपने बच्चों का बेहत्तर ख्याल रखें?
जवाब- मैं सभी पैरेटंस को यही सुझाव देना चाहूंगी कि बच्चों पर नजर रखिए। वो क्या खा रहा है, उसकी दोस्ती कैसे लोगों के साथ है। साथ ही वह कितने बजे सोता है, कितने बजे उठता है, और हो सके तो बच्चों को कभी रात में अकेला ना सोने दें, क्योंकि इसकी सबसे बडी वजह यही है कि आज के समय में बच्चों के पास मोबाईल फोन हैं, जिससे बच्चे उसमें वो अनावश्यक चीजें देखने लगते हैं जो उनके लिए हानिकारक हैं। इसलिए जितना हो सके उतना बच्चों पर ध्यान रखें ।

अपने बच्चों को कैसे समझें ?

बच्चों को समझने के लिए सबसे आसान तरीका है कि उनसे रोजमर्रा के अनुभवों के बारे में बात की जाए। बच्चों से बात करें कि स्कूल में उनका दिन कैसा रहा? कौन सी बात उनको सबसे ज्यादा अच्छी लगी। खेल इवेंट में उनको कौन सी बात अच्छी लगी। उनको कौन सी शिक्षक सबसे ज्यादा पसंद हैं? उनको कौन सी चीजें पसंद है इत्यादि। जो माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज्यादा समय बितातें हैं उनके लिए बच्चों को समझना काफी आसान होता है।

बच्चों के साथ खेलने के लिए निकालें वक्त

माता-पिता को अपने बच्चों के साथ नियमित रूप से खेलने का समय निकालना चाहिए। यह बच्चों के संवेगात्मक विकास के लिए काफी अच्छा माना जाता है। अगर आप सिंगल पैरेंट हैं तो अपने दोस्तों को घर पर इनवाइट करें या फिर बच्चे को अपने साथ लेकर दोस्तों के घर जाएं ताकि बच्चों को अन्य बच्चों व लोगों का साथ मिल सके।

सामाजिक कौशलों का विकास है जरूरी

बतौर माता-पिता हमें बच्चों बच्चे के दीर्घकालीन भविष्य को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए। इससे हम बच्चों को सामाजिक कौशलों के विकास और समायोजन में ज्यादा व्यवस्थित ढंग से मदद कर पाएं। बच्चे के नए प्रयासों के लिए उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। जबकि किसी प्रतिस्पर्धा में पीछे रहने पर भी बच्चों का हौसला बढ़ाना चाहिए कि में हर बार जीत नहीं मिलती। हमें कोशिश करनी पड़ती है खुद को प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए और उसमें कामयाबी हासिल करने के लिए।

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