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अरे ‘कोई’ है…जो इस शहर की सुध ले…

 जो सरकार दस दिन से राजधानी की सफाई व्यवस्था पर काबू नहीं पा सकती उस सरकार से बाकी क्या उम्मीद की जा सकती है?

अरे ‘कोई’ है…जो इस शहर की सुध ले…

 जो सरकार दस दिन से राजधानी की सफाई व्यवस्था पर काबू नहीं पा सकती उस सरकार से बाकी क्या उम्मीद की जा सकती है?

योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार, राज्य आंदोलनकारी
योगेश भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार, राज्य आंदोलनकारी

देहरादून।  देहरादून शहर ‘तड़प’ रहा है, ‘कराह’ रहा है, लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। यह कैसी सियासत से रूबरू हो रहा है शहर? कोई शहर की बदहाली पर अपनी सियासी रोटियां सेक रहा है तो कोई समस्या से मुंह फेर रहा है। पूरी सरकार राजधानी से दूर टिहरी झील का आनंद उठा रही है। शहर में फैली गंदगी की परवाह किसी को नहीं। परवाह है तो ‘शह मात’ के ‘खेल’ की।
आज शहर का जो हाल है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि इस शहर को लेकर सरकार और सिस्टम संवेदनशील हैं। पिछले दस दिन से सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं, शहर कूड़े के ढेर में तब्दील हो गया है। चारों ओर वातावरण में दुर्गंध फैली है, महामारी का खतरा बना है। अफसोस सरकार और उसका पूरा तंत्र या तो लाचार है या सबकुछ जानते बूझते बेपरवाह है। सरकार न सफाई कर्मचारियों की हड़ताल खत्म कराने में कामयाब रही और न सफाई की कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाने में।

देहरादून में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के सफाई व्यवस्था ठप है। अब तो नगर निगम सरकार के हवाले है, ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार फैसला क्यों नहीं करती? क्या सफाई कर्मी नाजायज मांग कर रहे हैं? अगर उनकी मांग नाजायज हैं तो सरकार क्यों कड़े कदम नहीं उठाती, किसने रोका है? आखिर शहर और शहरवासियों की जिंदगी से खिलवाड़ की इजाजत तो किसी को किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती। राजधानी में दस दिन से सफाई कर्मचारियों की हड़ताल चलना कोई मामूली बात नहीं। 

दस दिन से सफाई न होने के कारण शहर में आम लोगों को क्या झेलना पड़ा है या उनकी सेहत को क्या नुकसान पहुंचा है इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। हड़ताल का कारण यदि जायज है तो फिर यह घोर दर्जे की लापरवाही है। फिर तो यह पड़ताल भी जरूरी है कि आखिर क्यों ऐसी नौबत आयी कि बात इतनी आगे बढ़ी? इस लापरवाही की जिम्मेदारी भी तय किया जाना जरूरी है, लेकिन यह तभी संभव है जब सरकार संवेदनशील हो और उसे शहरवासियों की फिक्र हो। 

इधर तो हालात बिलकुल उलट हैं। सरकार को शहर के लोगों की फिक्र तो छोडिये, देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की परवाह भी नहीं कि वे देहरादून के बारे में क्या संदेश लेकर जाएंगे। राजधानी में सफाई के मुद्दे को लेकर तो सरकार के रवैये पर आश्चर्य होता है। स्वच्छता का हर नारा इन दिनों राजधानी में बेइमानी है। आखिर सफाई कर्मचारी ऐसी कौन सी मांग कर रहे हैं, जिसका कि समाधान सरकार के लिये संभव नहीं? हड़ताली सफाई कर्मचारियों की एक मात्र मांग है कि 408 सफाई कर्मचारियों को संविदा पर रखा जाए।
ऐसा भी नहीं है कि सरकार को नए पद स्वीकृत करने हैं, संविदा के इन पदों को हरी झंडी भी पूर्व सरकार में मिली हुई है। मौहल्ला स्वच्छता समितियों में जो 610 कर्मचारी काम कर रहे हैं, उन्हीं में से वरिष्ठता के आधार पर 408 कर्मचारियों को संविदा पर लिया जाना है। लंबे समय से यह प्रकरण निगम और शासन के बीच फंसा हुआ है। सरकार चाहे, राजनैतिक इच्छाशक्ति हो तो आसानी से इसका समाधान भी हो सकता है। 

जो सरकार बिना मांग के विधायक निधि बढ़ा सकती है, मंत्री विधायकों के वेतन में सौ फीसदी से अधिक बढ़ोतरी कर सकती है। उसे सफाई कर्मचारियों के बारे में कोई फैसला लेने में आखिर क्या परेशानी हो सकती है? केदारनाथ से पूरे देश भर में सरकार की इमेज चमकाने के लिए जब कोई भी नियम, कायदे, कानून या कोई शासनादेश सरकार के आड़े नहीं आता, तो सफाई कर्मचारियों के मामले में सरकार को दिक्कत कैसे आ सकती है जबकि सच यह है कि शहर की सफाई व्यवस्था नाजुक दौर में है। पूरी राजधानी की सफाई का जिम्मा मात्र 900 के करीब सफाई कर्मचारियों के ऊपर है। वे भी पूरी तरह से असुरक्षित हैं, सफाई के लिये कोई उपकरण नहीं, और तो और दस्ताने और मास्क तक उपलब्ध नहीं। स्वच्छ दून, साफ दून और स्मार्ट दून के लिए जरूरी है सरकार सफाई कर्मचारियों पर खास ध्यान दे, उन्हें हर तरह की सुरक्षा मुहैय्या कराए।

दुर्भाग्य यह है कि राजधानी में सफाई व्यवस्था का हल निकलने बजाय सियासत शुरू हो चली है। जैसे-जैसे शहर में कूड़े की दुर्गंध बढ़ती जा रही है, सियासत भी गर्म होती जा रही है। सत्ता पक्ष और विपक्ष हड़ताल के विरोध और समर्थन में उतरे हुए हैं। शहर और शहर की व्यवस्था हाशिये पर है। किसी को यह फिक्र नहीं कि शहर को इस शह-मात के खेल की कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी। सरकार भी शायद यह भूल रही है कि सवाल अब सिर्फ देहरादून का नहीं है, सवाल राजकाज का भी है। क्योंकि देहरादून सिर्फ एक शहर ही नहीं बल्कि प्रदेश की सत्ता का केंद्र भी है। अगर देहरादून में ही हालात नियंत्रण में नहीं हैं तो सवाल सीधे सरकार की साख का है। जो सरकार दस दिन से राजधानी की सफाई व्यवस्था पर काबू नहीं पा सकती उस सरकार से बाकी क्या उम्मीद की जा सकती है? न निगम, न सरकार, न और कोई…तो फिर कौन है इस शहर की सुध लेने वाला ?

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